बह्र:-22 22 22 22 22 2
काफिया:-आना,रदीफ़:-लगता है।
जीवन यह अनसुलझा माना लगता है
सम्हल सम्हल कर पाँव बढ़ाना लगता है।
रिश्तों को बुनते हैं हम सब जीवन में
यह रिश्ता ही तो जाना माना लगता है।
रिश्तों को जीना दूभर मत करना यारों
रिश्तों से ही सफर सुहाना लगता है।
सम्बन्धों को तुरपो हरदम धैर्य बढ़ाकर
सम्बंधों में समय ख़जाना लगता है।
दुनियादारी में सब देखो गौर करो
समझो क्यूँ अपना अपनाना लगता है।
जितना भी हो खुद से बढ़कर किया करो
अपनों का दुःख दर्द बटाना लगता है।।
अपने ही होते अपने हैं जीवन में
औरों से रिश्तों को बनाना पड़ता है।
आग लगी गर अपनों के मन मन्दिर में तो
बुझते बुझते एक जमाना लगता है।
अवनीश
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