शुक्रवार, 22 मई 2026

व्रजरसमाधुरी

 मद्धम मद्धम पवन बहत नित रहत सुगंध लुटाई

डाली डाली झूमत निसदिन लेत रहत अंगड़ाई।

शुक सारिक डालिन पर निवसत रहत मंद मुसुकाई

भागि सुभागि भयो अवनीश के बरनत हिय हर्षाई।१।


जागि गये प्रभु नटवर नागर वृन्दावन विच जाई 

राधा प्राणप्रिया संग निरतत वेणुमधुर धुनि लाई।

संग समस्त गोपिजन विलसत मनहि उमंग समाई

देखि प्रात मंगल छवि पुलकित जनजन मन हर्षाई।२।


ग्वालबाल गइयन संग विचरत नंदकिशोर कन्हाई

यमुना तट पट ओढ़ि गोपिजन भरन जात जल भाई।

मध्यमार्ग प्रभु करत तंग संग सखा रहत मुसुकाई

गोपिन कर मटकी नित फोरत बांह पकरि हर्षाई।३।


कालिंदी तट खेलत थिरकत चंचल कृष्ण कन्हाई

वेणु बजावत गावत ध्यावत गइयन सब पगुराई।

कन्दु गयो जमुना जल में तब कूदि पड़े मचलाई 

कालियनाग नाथि फन निरतत नटवर कृष्ण कन्हाई।४।


वृन्दावन जन व्याकुल धावत  जमुना तट झट आई

नन्द यशोदा जानि सकल वृत व्याकुल धाये भाई।

देखि नाग फन निरतत हर्षित श्यामल चपल कन्हाई

अति आनन्दित ग्वालबाल संग नंदयशोदा माई।५।


जग तारन प्रभु जग अवतरि शिशु वसत नंदगृह जाई

गोपीजन ऋषिमुनि तपधन सब  वेदऋचा ऋजुताई।

रूप धार मानव बनि आये देवन अति  सुख पाई

कहत सुनत प्रभु चरित मनोहर हिय आंनद समाई।६।


निरखि श्यामकर बाल रूप मन देवन कर हर्षाई

रूपशील गुण चपल कृष्णकर निरखि निरखि मन भाई।

माखन खात खियावत प्रभु नित ग्वालबाल संग जाई

धन्य सरस्वति भइ अवनीश की बरनत चरित कन्हाई।७।


डॉ०अवनीशधरद्विवेदी

  शिवगङ्गा वसुन्धरा 

    ०७/०५/२०२६

     💐💐🙏🙏

वर्षा

 हे प्रभो वर्षणं स्याद्वयं त्वातुरा:

चित्तचिन्ताधुना स्मो वयं त्वातुराः ।


कामयामो वयं वर्षणं स्याद्यथा

मेघमादिष्यातां स्मो वयं त्वातुराः।


सर्वत: शुष्कता स्वेदाधरा: सदा

पश्यतो निर्जलं स्मो वयं त्वातुरा:।


कामयन्तो जलं शीतलं निर्मलम्

व्याकुला:स्म: जलार्थं वयं त्वातुरा:।


मीनका वै यथा रिक्त ताडागका:

व्याकुलाःप्रार्थयन्ते वयं त्वातुरा:।


रिक्तरिक्तास्ताः समस्ता:जलस्थानकाः

शुष्कवृक्षा विदग्धा: वयं त्वातुरा:।


पक्षिणो यान्ति दूरं जलं यत्र वै

वारिजा नैव सक्ता वयं त्वातुरा:।


ग्रीष्मदाघो दहन्वर्तते प्रत्यहम्

हे प्रभो रक्षिता: स्मो वयं त्वातुरा:।


दाघसंतप्तकानां शरण्यो भवान्

पातु सर्वान्नमामो वयं त्वातुराः ।।


वक्तिदासानुदासोऽवनीशोधरो

वर्षणात्पातु नाथो वयं त्वातुरा:।।


डॉ०अवनीशधरद्विवेदी

   शिवगङ्गा वसुंधरा 

    १९/०५/२०२६

गुरुवार, 23 अप्रैल 2026

शिवस्तुति

शम्भुसदाशिव धरत ध्यान बाघाम्बरधारी कैलाशी

गौरी नंदी सङ्ग सदा अरु भृङ्गी सेवत अविनाशी।

खेलत सुत कार्तिकगणेश वृषवाहन शङ्कर अघनाशी

गङ्गजटा में चंद्रशीश पर शोभत पन्नग सुखराशी ।१।


देव दनुज मनु सेवत शिव को ध्यान निरत शिव अविकारी

गिरिजापति गिरिशिखर विराजित मुण्डमाल गल त्रिपुरारी।

पालक सर्जक प्रलयङ्कर हर महदेव शिव स्मरहारी

जटाजूट अरु सर्प सुशोभित दुष्टदलन प्रभु सुखकारी।२।


मृत्युञ्जय अभयङ्कर शङ्कर महाकाल शिव वरदानी

आशुतोष प्रलयङ्कर किङ्कर भक्तसदय औघड़दानी ।

दाता हो प्रभु तुम मङ्गलकर भर देते झोली दानी

दास तुम्हारे स्वर्णपुरी में रहते आप तो बर्फ़ानी।३।


महाकाल सृष्ट्यंतक विषधर नीलकंठ त्र्यम्बक शम्भो

महारुद्र महिपति अनंगरिपु अपराजित आनंद विभो।

ध्यानलीन कैलाशनिवासिन् भक्त अभयवरदान करो

ब्रह्म सनातन शाश्वत द्रष्टा संचालक जगदीश प्रभो।४।


पंचमुखी अर्धाङ्ग नीलगल वामदेव हो त्रिपुरारी

ज्येष्ठ आप हो श्रेष्ठ आप प्रभु विश्वनाथ कलिमलहारी।

भस्मविभूषित अङ्ग शंभु डमरूकर धृत नटनरनारी

नृत्यकरत नटराज राज सुरपति रामेश्वर शिवकारी।५।


भक्त अभयप्रद आशुतोष हर हर लेते विपदा सारी

सेवत नित्य जगत्पति तुमको ध्यान धरत रत नरनारी।

योगी हो योगेश्वर प्रभु तुम वरदहस्त धूर्जटि भारी 

पान करत हालाहल विष का भैरव तुम संकटहारी।६।


निराकार साकाररूप शिव आदि अनंत स्वयंभुव स्वामी

पारब्रह्म परमेश्वर सर्जक संहारक तुम अंतर्यामी ।

ग्यारहरुद्र महेश आपको ध्यावत इंद्रादिक नामी

दुःख हरो अवनीश भगत की हर शम्भो त्रिभुवनगामी

।७।


डॉ.अवनीश

ग़जल

अब तो मुझको गीत गजल लिखना होगा

दिल के भावों को शब्दों में लिखना होगा।


कहना होगा मन की सारी चतुराई को

कलम उठाकर हाथों में दिखना होगा।


होता है ये मन यारा अब तो विह्वल 

विह्वल मन से गीतप्रीत कितना होगा।


दिल में बसते हो स्वासों से तुम मेरे

धड़कन बनकर दिल में तुम्हें धड़कना होगा।


जीवन दिखता औरों का सीधा जितना

जीवन सीधा होता नहीं समझना होगा।


मेहनत करनी पड़ती है जीवन भर यारों 

दो रोटी की खातिर क्या-क्या करना होगा।


दुनिया इतनी सरल नहीं इसके नखरे हैं 

दुनिया के नखरों से बचकर चलना होगा।


दर्द को दिल में रख लो यारों तुम अपने

बेदर्दों से हरदम मिलना जुलना होगा।


मृगनयनी की कातर चितवन को देखा

खुद को भूला मृगतृष्णा में जलना होगा।


तेरी हिरनी सी मनमोहक रुत देखी

सबकुछ भूला अवनिश अब तो मिलना होगा।


  डॉ.अवनीश 

शिवगङ्गा वसुन्धरा 

 २१/०४/२६

    💐💐

गुरुवार, 16 मई 2024

माँ

 माँ बस शब्द नहीं माँ तो भाव है

सबके जीवन में माँ का प्रभाव है।


माँ तो साक्षात ईश्वर का रूप है 

माँ ही दुनियाँ में होती अनूप है।


माँ इस सृष्टि की सृजनहार है

माँ ही तो बच्चों का संसार है।


माँ का गौरव ईश्वर से भी ज्यादा है

माँ ही तो हम सब की मर्यादा है।


मातृ सुख को देव भी तरसते हैं

माँ के लिए धरती पर अवतरते हैं।


माँ ही ईश्वर  को धारण करती है

माँ ही कष्ट निवारण करती है।


माँ की महिमा बहुत निराली है

माँ है तो होली और दिवाली है।


माँ के जैसी ममता कहाँ है

दुनियाँ में त्याग की मूरत माँ है ।


माँ के लिए एक दिन इसका गम है 

माँ का बखान निशिदिन भी कम है।


माँ  तेरी याद बहुत सताती है

ममतामयी छाँव न मिल पाती है ।


सब है तेरे आशीर्वाद से ही माँ 

तेरे बिन मिले वो स्नेह कहाँ।


तुझे याद कर करके रोता हूँ 

हो अधीर यादों के बीज बोता हूँ ।


    अवनीश

    शिवगङ्गा 

मातृदिवस विशेष

१२/०५/२०२४


मजदूर

हैं हमारे ही स्वजन मजदूर जिनका नाम है।

हर तरक्की में सदा दिखता उन्हीं का काम है ।

उनके बल पर ही चले तो शहर विकासित हो गये

और उन शहरों में  जाने कर्मठी कब खो गये।


है बड़ा ऋण आज शहरों पर हमें है सोचना

जिनके दम से राह तय की उनकी क्यूँ आलोचना।

यह दिवस उनको समर्पित करके क्या पाएंगे हम

उनके ऋण से मुक्त क्या सोचो कभी हो जाएंगे हम?


सच में उनको चाहते हैं हम सभी कुछ दें अगर

स्नेह से उनकी करें हम सब सदा मिल वंदना।

जो परिश्रम के बदौलत करते हैं मुमकिन सदा

लक्ष्य उनसे  कब रहा है दूर उनकी यह अदा।


वो भी खुश होकर रहें न हो उन्हें कुछ वेदना

हम सभी शहरी जनों में हो अधिक संवेदना।

उनका जीवन भी बने उन्नत हमारे ही नगर सा

हैं ये ही मजदूर जिनसे हो रही सच कल्पना।


काम कर मजदूर माँगे अपनी मजदूरी जभी

स्नेह और सम्मान पूर्वक दें न हो दूरी कभी।

हैं सदा सम्मान के हक़दार ये श्रम के बली

पत्थरों में हैं ये करते प्राण का संचार भी।।


✍️अवनीश

     शिवगंगा

 ०१/०५/२०२४

बुधवार, 17 अप्रैल 2024

राम

 हे राम अहिल्या के तारक 

शबरी उद्धारक राम प्रभो ।

सच्चिदानंघन राम विभो

दशरथनन्दन श्रीराम सुनो।


हे करुणालय जग सर्जक हे

कौशल्यानंदन राम प्रभो ।

हे रघुकुलतिलक महाबल हे

हे राजधर्मधुरि धाम सुनो।


हे ऋषिमुनि तारक राम सुनो

हे जगदुद्धारक राम सुनो।

हे रामरमापति राघव हे

हे घट घटवासी  कष्ट हरो।


हे रावणदर्प विनाशक हे 

गुरुमातु पिताव्रतपालक हे।

शरणागत रक्षक प्राणप्रिय 

हे राम जगद्विश्राम विभो।


हे दुष्टदलन जीवन्मूर्ति

वीरव्रत सखाधर्म पालक।

हे जगस्रष्टा जगपालक हे

श्रीराम नमामि प्रभो सततम्।


नानाव्रत रक्षण हेतु स्वयं

जगपालन हेतु स्वयं आते।

हे राम परात्पर  ब्रह्म स्वयं

जग के हो तुम खेवन हारे ।


सुदि चैत्र मास नवमी तिथि को

दशरथनन्दन प्रभु अवतारे।

साकेतधाम सरयूतट पर

रघुकुलभूषण मनुतन धारे।।


    अवनीश

शिवागंगा वसुंधरा 

  १७/४/२०२४

 💐💐🙏🙏

व्रजरसमाधुरी

 मद्धम मद्धम पवन बहत नित रहत सुगंध लुटाई डाली डाली झूमत निसदिन लेत रहत अंगड़ाई। शुक सारिक डालिन पर निवसत रहत मंद मुसुकाई भागि सुभागि भयो अवन...