गुरुवार, 16 मई 2024

माँ

 माँ बस शब्द नहीं माँ तो भाव है

सबके जीवन में माँ का प्रभाव है।


माँ तो साक्षात ईश्वर का रूप है 

माँ ही दुनियाँ में होती अनूप है।


माँ इस सृष्टि की सृजनहार है

माँ ही तो बच्चों का संसार है।


माँ का गौरव ईश्वर से भी ज्यादा है

माँ ही तो हम सब की मर्यादा है।


मातृ सुख को देव भी तरसते हैं

माँ के लिए धरती पर अवतरते हैं।


माँ ही ईश्वर  को धारण करती है

माँ ही कष्ट निवारण करती है।


माँ की महिमा बहुत निराली है

माँ है तो होली और दिवाली है।


माँ के जैसी ममता कहाँ है

दुनियाँ में त्याग की मूरत माँ है ।


माँ के लिए एक दिन इसका गम है 

माँ का बखान निशिदिन भी कम है।


माँ  तेरी याद बहुत सताती है

ममतामयी छाँव न मिल पाती है ।


सब है तेरे आशीर्वाद से ही माँ 

तेरे बिन मिले वो स्नेह कहाँ।


तुझे याद कर करके रोता हूँ 

हो अधीर यादों के बीज बोता हूँ ।


    अवनीश

    शिवगङ्गा 

मातृदिवस विशेष

१२/०५/२०२४


मजदूर

हैं हमारे ही स्वजन मजदूर जिनका नाम है।

हर तरक्की में सदा दिखता उन्हीं का काम है ।

उनके बल पर ही चले तो शहर विकासित हो गये

और उन शहरों में  जाने कर्मठी कब खो गये।


है बड़ा ऋण आज शहरों पर हमें है सोचना

जिनके दम से राह तय की उनकी क्यूँ आलोचना।

यह दिवस उनको समर्पित करके क्या पाएंगे हम

उनके ऋण से मुक्त क्या सोचो कभी हो जाएंगे हम?


सच में उनको चाहते हैं हम सभी कुछ दें अगर

स्नेह से उनकी करें हम सब सदा मिल वंदना।

जो परिश्रम के बदौलत करते हैं मुमकिन सदा

लक्ष्य उनसे  कब रहा है दूर उनकी यह अदा।


वो भी खुश होकर रहें न हो उन्हें कुछ वेदना

हम सभी शहरी जनों में हो अधिक संवेदना।

उनका जीवन भी बने उन्नत हमारे ही नगर सा

हैं ये ही मजदूर जिनसे हो रही सच कल्पना।


काम कर मजदूर माँगे अपनी मजदूरी जभी

स्नेह और सम्मान पूर्वक दें न हो दूरी कभी।

हैं सदा सम्मान के हक़दार ये श्रम के बली

पत्थरों में हैं ये करते प्राण का संचार भी।।


✍️अवनीश

     शिवगंगा

 ०१/०५/२०२४

व्रजरसमाधुरी

 मद्धम मद्धम पवन बहत नित रहत सुगंध लुटाई डाली डाली झूमत निसदिन लेत रहत अंगड़ाई। शुक सारिक डालिन पर निवसत रहत मंद मुसुकाई भागि सुभागि भयो अवन...