रविवार, 1 अगस्त 2021

माँ

बिना बोले हमारी भावनाओं को जो पढ़ लेती,

हमारी माँ हमारी धड़कनों से बात कर लेती।

बहुत उत्तम थी तकनीकी हमारी माँ के आँखों की,

बिना बोले ही माँ हर दर्द को हरदम समझ लेती ।1।


नहीं है माँ मनुज का रूप ईश्वर की है प्रतिमूर्ति,

सभी सुख सम्पदा फलती है टलती आपदापूर्ति।

यही हर युग में ईश्वर का हुआ करती सदा प्रतिनिधि,

तभी तो इस जहाँ में माँ की गाते हैं सभी कीर्ति।2।


यही माता है कारण जीव के इस जग में आने का,

यही माता निवारण इस जहाँ में दर्द जाने का।

यही माता परम्पद को दिलाने की परम सीढ़ी,

इसी के आशिषों से पार भव सागर के बन्धन का।3।


यही माता जगत में पुत्र को ध्रुव सा बना देती,

यही माता शिशु को कृष्ण और श्रीराम कर देती।

यही माता जगत् की सर्वथा अनुपम धरोहर है,

यही सबको सदा जनती सदा निज आशिषें देती।4।


यही माता पिला निज रक्त को अनुरक्त कर देती,

रहे चाहे जहाँ भी पाल्य को माता दुआ देती।

बिना निज स्वार्थ के जो इस जगत में प्रेम करती है,

वही माता है यारों सन्तति को जो जनम देती।5।


इसी माँ की कृपा पाने को ईश्वर भी तरसते हैं,

तभी धरकर धरा पर रूप ईश्वर खुद उतरते हैं।

किया करते मनुज के रूप में लीला परम न्यारी,

कभी रामा कभी कान्हा कभी कल्की संवरते हैं।6।


अवनीश।। 

पर्यावरण गीत

पर्यावरण सुरक्षित हो अब यह संकल्प हमारा हो

प्रकृति प्रेम निःस्वार्थ करें सब यह नित ध्येय हमारा हो।


नदियाँ झरने झील तलाब दिया है सब कुछ प्रकृति ने।

पेड़ वनस्पति जड़ी बूटियां सब कुछ किये हैं सुकृति ने।

फिर हम क्यूँ हैं फिरते मारे नाता बना हमारा हो।

प्रकृति प्रेम निःस्वार्थ करें सब ...........।१।


प्रकृति माता पालन करती उससे जो जुड़ जायें हम।

जीव-जन्तु सब आवश्यक हैं उनका मान बढायें हम।

इस धरती पर हक़ है सबका जीव मात्र का नारा हो।

प्रकृतिक प्रेम निःस्वार्थ करें सब........।२।


पेड़ पौध हरियाली गहना धरती माँ के ये सब हैं

जैसे जीवन हममें तुममें वैसे ही इन सबमें है।

देते हैं नित स्वच्छ वायु जल वर्षा के भी कारक हैं 

इनका संरक्षण कर मानव जीवन सफल तुम्हारा हो।

प्रकृति प्रेम निःस्वार्थ करें सब....।३।


वृक्ष लगायें नदी बावड़ी पर्वतादि ना दूषित हों

कार्बन उत्सर्जन अति कम हो नदियाँ नहीं प्रदूषित हों।

स्वच्छ वायु औ नीर को जन नहिं भटके कहीं बेचारा हो।

प्रकृति प्रेम निःस्वार्थ करें सब......।४।


अवनीश

💐🪴🙏

व्रजरसमाधुरी

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