शनिवार, 24 जुलाई 2021

मां बाप पर जाँ लुटाते हैं

 ग़ज़ल:-1222,1222,1222,1222


बहुत ही भाग्यशाली लोग जो खुशियाँ लुटाते हैं।

किया करते हैं सेवा माँ-पिता पर जाँ लुटाते हैं।।


बहुत प्यारे हैं वो बेटे जो माँ की फिक्र करते हैं।

यहीं है वास्तविक अपवर्ग जो बेटे दिलाते हैं।


बढाया है पिता ने सन्तति खुद को तपा करके।

वहीं पी दूध माँ के ही शिशु फिर दौड़ पाते हैं।


नहीं उन्नृण कभी भी हो सकेंगे कर्ज से उनके।

हमें माता-पिता हरदम विपत्ति से बचाते हैं।


फटी जो पाँव में रहती बेवाई बाबू जी के है।

कड़ी मेहनत पसीने से ही बच्चे पाले जाते हैं।


यहाँ घर में सभी मायें किया करती जतन लाखों।

तभी बच्चे सदा माँ से मधुरतं भोज्य पाते हैं।।


इसलिये हैं सभी कहते कि महिमा है बहुत न्यारी।

इसी जीवन में बन ईश्वर स्वयं माँ बाप आते हैं।।


   अवनीश

💐💐🙏🙏


भले हालात का मारा हुआ हूँ।

#ग़ज़ल:-1222 1222 122


नहीं ऐ जिंदगी तुझसे खफा हूँ।

भले हालात का मारा हुआ हूँ।


गरीबी भा गई है इस कदर कि

गरीबी से ही मैं हारा हुआ हूँ।


मुसीबत नाम ही है जिंदगी

मुसीबत का ही मैं चारा हुआ हूँ।।


निभाती जिस क़दर यारी मुसीबत

उसी शिद्दत को मैं प्यारा हुआ हूँ।


जहाँ में कौन जो चाहे मुसीबत

यहाँ हालात से खारा हुआ हूँ।


नहीं कोई सताये अब किसी को

सताया उम्र भर यारा हुआ हूँ।


बड़ी कातिल अदा है ये मुसीबत

कहे अवनीश अब न्यारा हुआ हूँ।।


   अवनीश

💐💐🙏🙏 

ग़ज़ल

 बह्र:-2122 2122 2122 2122

फ़ाइलातुनx4 


लोग कहते हैं गई जो इश्क का जादू चलाकर।

वो खयालों में छिपी है नींद को मेरी भगाकर।


नींद का माहिर तपस्वी था बहुत ही सिद्ध मैं तो।

पड़ गया हूँ इश्क में अब नींद को अपनी भुला कर।2।


इन हसीनाओं की बातें दूर से लगती भली हैं।

पास से देखो तो रखती हैं हमें हरदम रुला कर।3।


पा सबक मैं दे रहा सबको सलाहें मान लो ये।

खुद से मत फन्दा लगाना ख्वाहिशें अपनी बढाकर।4।


इश्क के दरिया में आखिर साहिलों को ढूंढना क्यूँ।

लोग इसमें तैरते हैं होश को हरदम गवांकर।5।


इश्क में दुनियाँ की होती सैर,बातें चटपटी पर।

कह रहा अवनीश सच,समझो,रहो इज्जत बचाकर।6।


   अवनीश

💐💐🙏🙏


ग़ज़ल

 #बह्र:-22 22 22 22 22 22 22 2 

#आरों #काफिया #और 

#पर #रदीफ़

                  

जनता से है लोकतन्त्र यह जनता के संचारों पर।

जनता का हक़ लोकतंत्र के बुनियादी अधिकारों पर।1।


जनता को यूँ मूर्ख समझना नेताओं अब कर दो दूर।

जनता तो सब जान रही है पोस्टर जो दीवारों पर।2।


अब यह जनता समझ रही है नेताओं की सारी चाल।

चिकनी चुपड़ी बातें करते मतदानी त्योहारों पर।3।


रैली में हैं नेता रटते जनता के अधिकारों को।

कौन भरोसा करे असल में कागज के किरदारों पर।4।


दु:खियारे लोगों का जीवन देखो कितना विपत भरा।

भूखे प्यासे सो जाते हैं नीचे ही अखबारों पर।5।


दुःखित पीड़ित शोषित वंचित कृषक वर्ग का दर्द कहाँ?

हमने अब यह ठाना है कि सत्य कहें सरकारों पर।6।


लोकतंत्र का अजब मन्त्र है सिद्ध हुआ नेताओं को।

पाँच साल में पड़ती थापें देखो ढोल नगारों पर।7।


कलमगार हूँ सत्य कहूँगा पीर लिखूँगा हर मन की।

लिखता ग़ज़ल नहीं मैं केवल मादक नयन कटारों पर।8।


अब क्यूँ है पछतावा करना भीग रहा हर कोना जब।

हमने ही तस्वीर बनाई मिट्टी की दीवारों पर ।9।


   अवनीश

💐💐🙏🙏

ग़ज़ल

हमें बीते पल याद आने लगे हैं।

ग़ज़ल अपनी हम गुननाने लगे हैं।।


हमें क्या हुआ है कहें भी तो क्या हम।

तराने मोहब्बत के आने लगे हैं।।


कथानक बहुत से हृदय में हैं ताजे।

जिन्हें सोच कर मुस्कुराने लगे हैं।।


बड़े खूबसूरत थे बचपन के वो दिन।

हम बचपन के मृदु गीत गाने लगे हैं।।


हमें याद है माँ की लोरी,कहानी।

हम परियों को दिल में सजाने लगे हैं।।


पुराने समय के जो बीते हैं किस्से।

वही याद बनकर सताने लगे हैं।।


जिन्हें भूलकर छोड़ आये थे पीछे।

कई जख़्म फिर याद आने लगे हैं।।


कभी नींद से वो जगा मुझको देते।

कभी ख़्वाब बनकर वो आने लगे हैं।।


हैं जीवन के दस्तूर अपने निराले।

बँधे जिनसे सब छटपटाने लगे हैं।।


कलम कैसे लिख दे सफर जिन्दगी का?

जहाँ लोग सच को छुपाने लगे हैं।।


अवनीश।।

💐💐🙏🙏

ग़ज़ल

जीवन में रिश्तों को निभाना पड़ता है।

जीते जी हर दर्द छुपाना पड़ता है।


चाहे जितनी भी मजबूरी अपनी पर।

आगे बढ़कर हाथ बढ़ाना पड़ता है।


कभी नहीं पालो तुम कोई वहम यहाँ।

जो भी हो सबको ही जाना पड़ता है।


चाहे कोई कितना भी बनता हो बड़ा।

वक़्त के आगे शीश झुकाना पड़ता है।


ऊपर वाले का है बिल्कुल न्याय खरा।

बिना भेद निज कर्म का खाना पड़ता है।


प्रेम करो खुश रहो नहीं लो बैर किसी से।

सफ़र यहाँ नेकी का सुहाना पड़ता है।


जीवन में इंसान रहें हम नेक सदा ही।

जीवन में हर मोड़ से जाना पड़ता है।


इसीलिए कहता है सुनलो तुम अवनीश।

जो बोया वह काट के लाना पड़ता है।

   

    अवनीश                                                             💐💐🙏🙏

बुझते बुझते एक जमाना लगता है।

 बह्र:-22 22 22 22 22 2

काफिया:-आना,रदीफ़:-लगता है।


जीवन यह अनसुलझा माना लगता है

सम्हल सम्हल कर पाँव बढ़ाना लगता है।


रिश्तों को बुनते हैं हम सब जीवन में

यह रिश्ता ही तो जाना माना लगता है।


रिश्तों को जीना दूभर मत करना यारों

रिश्तों से ही सफर सुहाना लगता है।


सम्बन्धों को तुरपो हरदम धैर्य बढ़ाकर

सम्बंधों में समय ख़जाना लगता है।


दुनियादारी में सब देखो गौर करो

समझो क्यूँ अपना अपनाना लगता है।


जितना भी हो खुद से बढ़कर किया करो

अपनों का दुःख दर्द बटाना लगता है।।


अपने ही होते अपने हैं जीवन में

औरों से रिश्तों को बनाना पड़ता है।


आग लगी गर अपनों के मन मन्दिर में तो

बुझते बुझते एक जमाना लगता है।

अवनीश

ग़ज़ल

 दिल मेरा यह हाल देख घबराता है

शहर का अब मजदूरों से क्या नाता है।


खून पसीने से अपने था सींचा जिसको

बुरे दौर में दामन शहर छुड़ाता है।


आया संकट कोरोना का देश में जबसे

सड़कों पर लाचार मनुज दिख जाता है।


जिसने चमकाया शहरों को हो लथपथ

आज वही शहरों से फेंका जाता है।


देख दर्द होता है दिल में अब अवनीश

दुनियां को रचता क्या एक विधाता है।


मेहनत करने वाला क्यूँ दर दर भटके

क्यूँ नेता साहब सेठ ऐंठ  दिखलाता है।


अवनीश


ग़ज़ल

 मेरी सारी हसरतें इन वादियों में कैद हैं।

और चाहत की चिरैया घोंसलों में कैद है।


चाह लो सच का उजाला हर गली रोशन करे

इस जहाँ में अस्लियत बस भाषणों में कैद है।


हम चले थे जिन्दगी को प्यार का देने सिला।

ग़म यहाँ हर शख्स का उसके दिलों में कैद है।


भीड़ है हर ओर मेरे देख लो चाहे जिधर ।

फिर यहाँ हर शख्स क्यूँ तन्हाइयों में कैद है।


जिंदगी मानों ये मेरी हो रही मुझसे ख़फ़ा।

अब तो सबकुछ वक़्त की ही गर्दिशों में कैद है।


दर्द सबको है दिया क्या खूब कोविड ने यहाँ

आजकल हर आदमी खुद के घरों में कैद है।


रोज आता है तसव्वुर रहगुजर पर चल पड़ें।

सौ बहाने हैं अना के बन्धनों में कैद हैं।।


अवनीश

ग़ज़ल


समय को दोष देना क्यूँ समय जीना सिखाता है।

समय की गति सुनिश्चित है समय ही तो विधाता है।।


समय का खेल कुछ यूँ है कि कट जाए  हो जैसा भी।

कहीं गर हो बुरा तो भी ये अनुभव ही कराता है।।


बड़ा बलवान होता है समय इसकी बड़ी बातें।

कोई कितना भी सँभले पर  निवाला हो ही जाता है।।


समय को जिन्दगी में जो समझ ले है समय उसका।

अजब हैं खेल इसके ये कहाँ कुछ भी बताता है।।


अगर आमाल हो तेरे समय के साथ उम्दा तो।

सिला देकर  समय भी हौसला तेरा बढ़ाता है।।


फकीरी में मजा है जिंदगी का जान ले यारा।

नहीं छोटा बड़ा कोई समय ये भी सिखाता है।।


मैं वाकिफ़ हूँ समय की चाल से अवनीश जीवन में।

बड़ी से भी बड़ी ये सल्तनत को भी मिटाता है।।


✍️ अवनीश

"प्रियतमा-निर्झरिणी"

 

जीवन भर का साथ अगर मिल जाये तेरा।

जीवन धन्य हो बन जाये खुशियों का डेरा।


भाग दौड़ कर अपनी प्यास बुझाने को।

नदी नदी न घाट घाट हो जाने को।


अपनी ही बलखाती नदी का शीतल निर्मल।

पानी मिले अधर की प्यास मिटाने को।


मेरे खारे जीवन को तुझ नदिया का।

शीतल मीठा निर्मल जल हर्षाने को।


कभी-कभी तो बाढ़ सी भी आ जायेगी।

नदिया प्यारी सागर में मिल जाने को।


मेरे जीवन का सारा खारापन उसके।

मीठे पावन जल से खुद धुल जाने दो।


मेरा घर भी निर्झरिणी के शीतल जल से।

सुरभित झंकृत पावन सा बन जाने दो।।


अवनीश।।

गुरु-स्तुति

गुरु कृपा बनी रहे तो जीव भव से पार है

गुरुजनों को सर्वदा स्वशिष्य हेतु प्यार है।


गुरु के श्रम कठिन से होते शिष्यगण सुबुद्ध हैं

बिना गुरु के जिन्दगी में होता कब सुधार है।


गुरु सदैव ज्ञानदीप्ति की अलख जगाते हैं

गुरुजनों की ही वजह से होती नैया पार है।


गुरुजनों को सर्वदा प्रणाम शिष्यगण करें

गुरुजनों की आशिषों से चलती सर्वकार है।


गुरु दिखाते शिष्य को जगत् में सत्य मार्ग हैं

गुरु से ही निकलता भव के पार का सु-द्वार है।


गुरु ही श्रेष्ठपथ पे शिष्यगण को अग्रसर करें 

गुरु कृपा से मिलता ब्रह्मतत्व का भी सार है।


गुरुकृपा से आती है मनुष्यता महीयसी

गुरुजनों में दिव्यता स्वभाव भी उदार है।


अनाथ को सनाथते हैं ज्ञानचक्षु खोलकर

शिष्य शास्त्र सीखते परम्परा अपार है।


करूँ नमन गुरुजनों को पूर्णिमा तिथि के दिन

जीव की जगत् में गुरुकृपा ही पहरेदार है।।


अवनीश

शिवगंगा

२४/७/२०२१

💐💐🙏🙏

गुरुवार, 22 जुलाई 2021

ग़ज़ल

 हिम्मत और खुमारी रख                                         जब तक जां है जारी रख।

 वक़्त नहीं ठहरा करता है                                       हरदम ही तैयारी रख।

 कठिन परिश्रम करके प्यारे                                       खुद से दूर बिमारी रख।

 कातर कभी नहीं होना बस                                     दिल में तूं खुद्दारी रख।

 कितना भी हो दौर बुरा तूं                                       जंग सदा ही जारी रख।

 सच्चाई के मार्ग चलाकर                                     अच्छी आदत न्यारी रख।

 दीन दुखी सबकी कर सेवा                                   मानवता तूं प्यारी रख।

 सच्चा धर्म यही है प्यारे                                         नीयत नेक निहारी रख।

 कलम हाथ में है गर तेरे                                         लाज कलम की थारी रख।

 याद सदाकत की करके तूं                                     सारी दुनियाँदारी रख।

 कहता है अवनीश हमेशा                                         मन में मत दुश्वारी रख।।

    अवनीश                                                                  शिवगङ्गा                                                   22/7/2021                                                       💐💐🙏🙏

रविवार, 18 जुलाई 2021

जमाने हो गये

 जमाने हो गये हैं हे प्रभो                                         अब मर्म वह त्यागो।                                                   जरा आगे बढ़ो इस प्यास                                           को कमतर न तुम आंको ।

 हमारी प्यास की बस                                             आस है अब लेखनी मेरी।                                           यही है प्रियतमा मन की                                             यही है साधना मेरी।

 यही आराधना गीता                                               यही सीता यही श्रद्धा।                                             यही है वाहिनी संवाहिनी।                                       प्रिय प्रियतमा बद्धा।

 यही मेरी रमा है मनरमा                                           मेरी उमा साध्वी।                                                   यही है उर्वशी मेरी                                                 यही है मेनका माध्वी।

 यही है अंक में मेरे                                                 यही मेरी है प्रिय-अंका।                                         यही दीप्ति यही सुरभी                                           यही सुरभित है दिव्यङ्का।

 यही प्राणेश्वरी महिमा                                               रमा कल्याणी है काली।                                             यही है जीवनी मेरी                                             विनीता है मेरी लाली।

 यही बस जिन्दगी मेरी                                                 यही है सहधर्मिणी प्यारी।                                           यही मन की है अभिलाषा।                                     यही है लेखनी न्यारी।।

   अवनीश                                                              💐💐🙏🙏

माँ

 जिस सुखद पल को जिया हूँ                                   दर्द जीवन का पिया हूँ।                                           उस कमी के वक़्त में भी                                       जिस लगन से मैं जिया हूँ।

 उस गरीबी में अमीरी                                               थी हमारी उन दिनों।                                             सर पे साया माँ के आँचल                                       का था एक वरदान सा।

 मैं था नन्हा सा क्षितिज पर                                       माँ का था अभियान सा।                                         माँ की मीठी लोरियों में                                           इक सुधा थी जहान था।

 उसकी नयनों का था तारा                                     छोटा सा संसार सारा।                                             माँ के हाथों की वो रोटी                                         प्यार से उसको वो पोती।

 उस परम अमृत के आगे                                         आज का वैभव बेचारा।                                         भाव के ही अभाव में                                                 न स्वाद आता हूँ बेचारा।

 लाख व्यंजन हूँ मैं खाता                                           पर ललक न ढूंढ पाता।                                           माँ के आँचल का जो सुख                                       था वह नहीं मिलता दुबारा।

 अब तो बस यादों की रचना                                       से ही उसमें है सिमटना।                                           माँ तूँ तो अपरम्पार है                                                 तेरे बिना क्या सार है।

 जीवन वृथा संसार है                                               माँ तूँ सुखद तुँ अपार है।                                         माँ तूँ सरल अवतार है                                             माँ तूँ ही बस संसार है।

   अवनीश                                                            💐💐🙏🙏  

                                                            


जुगों से मैं भी हूँ प्यासा

 जुगों से मैं भी हूँ प्यासा                                           मुझे जी भर के पीने दो।

 नयन के अश्रु मत रोको                                         सुधा की धार पीने दो।

 सजल दोनों नयन क्यूँ हैं?                                       जहाँ अमृत उदधि भी है।

 जरा उसपार जाने दो                                             मुझे आकंठ पीने दो।

 निराशा को बदल आशा में                                       नित विश्वास को लाओ।

 जरा ठहरो मेरे यारों                                                 नई ऊर्जा संजोने दो।  

 यही है तंग हाली चार                                             दिन की मेहमा खाली।

 इसे करदो विदा होकर                                           फिदा तुम मस्त हो जाओ।

 चलो झूमों उठो उत्साह                                             से लबरेज हो जाओ।

 करो विश्वास खुद के साथ                                         उठो फिरसे चलो धीरे।

 मिलेगी राह हर वो चाह                                           हम जिसको नहीं भूले।

 करेगी खुद वरण स्वर्णिम                                   सफलता खुद हमें छूले।

 जरा उत्साह से एक आश                                         की फिर रौशनी लाओ।

 जुगों से हूँ मैं भी प्यासा                                           मुझे ना और तड़पाओ।

   अवनीश                                                 19/4/2020

दिल की बात

अपने दिल में जो लगी आग बुझानी न मुझे                  दर दर पे यूँ ही फरियाद सुनानी न मुझे।

वफ़ा की चाह नहीं कर रहा मैं तुमसे मगर                बेवफ़ा शख्स से न बात बतानी है मुझे।

चाहा था जिसको मैंने रब से भी बढ़चढ़ कर              छोड़ा था जिसके लिए मैनें अपना घर औ शहर।

बेवफाई किया उस शख्स ने ही सबसे ज्यादा                या ये कह दूं कि खोट मेरी ही किस्मत का था।

सोच कर बात ये अन्दर से सिहर जाता हूँ                    बन के मैं अश्क खुद की आँख से तर जाता हूँ।

गहरा ये दर्द है अवनीश कब बताता हूँ                          मैं तो दरिया हूँ गमों का जो बहता जाता हूँ।

ख्वाब में भी न मगर उसको कभी भूला मैं                  यादों में मैं उसी की ही ये ग़ज़ल गाता हूँ।

अवनीश



वाणीजन

 हम वाणी जन हैं वाणी के                                     कवि आलेखक हैं कलमकार।                                 मन जिनके निर्मल कोमल से                                 बहती निर्झर करुणा आपार।

संतप्त हृदय की आशाओं                                        का करते हैं सम्मान सदा।                                        जो दीन-हीन दुखियारे हैं                                        उनके रहते अभियान सदा।

जिनकी वाणी में द्रवित यहाँ                                    होता है बल नित अबला का।                                जिनकी चर्चा में दुःख रहता                                    नित सीता-गीता विमला का। 

 जिनकी कलमों की बारूदें                                       उन दुष्ट पिशाचों को रौंदे।                                   जिनके शब्दों के स्फोट सदा                                   नित कंस दशानन को कौंधे।

 हम उन्हीं ऋषी कुल के चारी                                   जद में रहते अत्याचारी।                                            नहीं वैर भाव वाणीन्द्रों का                                          ना देखी जाती लाचारी।

हर बार क्यूँ पिसती बेचारी?                                     दर दर भटके जनता सारी।।                                     क्यूँ मौज में रहते व्यभिचारी?                                   क्यूँ पीर से कृषकों की यारी?

क्यूँ मेहनत की रोटी भारी?                                    उद्योगों में भी बीमारी।                                          निज खून पसीना बहा रहे                                  मजदूरों की किस्मत मारी?

क्या कहूँ मैं कितना वाणी का                              साधक हूँ मैं है अनल बहुत।                              अवनीश हूँ कहता भरे कण्ठ                                    यह परिपाटी है गरल बहुत।

ग़ज़ल:-2122 2122 2122 212

  मेरी सारी हसरतें इन वादियों में कैद हैं।।                       और चाहत की चिरैया घोंसलों में कैद है।

 चाह लो सच का उजाला हर गली रोशन करे               इस जहाँ में अस्लियत बस भाषणों में कैद है।

 हम चले थे जिन्दगी को प्यार का देने सिला                 ग़म यहाँ हर शख्स का उसके दिलों में कैद है।

भीड़ है हर ओर मेरे देख लो चाहे जिधर                    फिर यहाँ हर शख्स क्यूँ तन्हाइयों में कैद है।

जिंदगी मानों ये मेरी हो रही मुझसे ख़फ़ा।                  अब तो सबकुछ वक़्त की ही गर्दिशों में कैद है।

दर्द सबको है दिया क्या खूब कोविड ने यहाँ        आजकल हर आदमी खुद के घरों में कैद है।

रोज आता है तसव्वुर रहगुजर पर चल पड़ें                  सौ बहाने हैं अना के बन्धनों में कैद हैं।

  अवनीश                                                                💐💐🙏🙏      




दिल मेरा घबराता है

दिल मेरा यह हाल देख घबराता है।                         शहर का अब मजदूरों से क्या नाता है।

खून पसीने से अपने था सींचा जिसको।                        बुरे दौर में दामन शहर छुड़ाता है।

आया संकट कोरोना का देश में जबसे।                  सड़कों पर लाचार मनुज दिख जाता है।

जिसने चमकाया शहरों को हो लथपथ।                    आज वही शहरों से फेंका जाता है।

देख दर्द होता है दिल में अब अवनीश।                    दुनियां को रचता क्या एक विधाता है।

मेहनत करने वाला क्यूँ दर दर भटके।                        क्यूँ नेता साहब सेठ ऐंठ  दिखलाता है।

  अवनीश                                                                💐💐🙏🙏 



श्रीकृष्ण-स्तुति

गोवर्द्धन गिरि धारक की जय

यमुना के उद्धारक की जय।
कालिय दर्प विदारक की जय
कंसक्रूर संघारक की जय।१।

वेणुवाद विस्तारक की जय
सत्य धर्म धुरि धारक की जय।
सन्त गुणी जन तारक की जय
प्रेम सुधा संचारक की जय।२।

पार्थ मोह संवारक की जय
कर्ममार्ग विस्तारक की जय।
दिव्ययोग संचारक की जय
सकल द्वन्द्व निवारक की जय।३।

भक्त सुजन दुःख हारक की जय
दीन हीन गति कारक की जय।
परम मित्र उपकारक की जय
देवमनुज दुःखहारक की जय।४।

पाञ्चाली उद्धारक की जय
भक्त भक्ति भव तारक की जय।
चीरहरण से वारक की जय
शिशुपालक संहारक की जय।५।

   अवनीश
💐💐🙏🙏

माँ

 माँ की ममता के आगे तो।                                       सब कुछ ही बौना लगता है।                                     माँ का ही जग में ईश्वर सा।                                       एक रूप सलोना लगता है।१।

 ईश्वर ने ही माँ को अपना
 जन प्रतिनिधि है सुदृढ़ किया।
 है सर्व सहा धारण कर्त्री
 माता ने शिशु को जन्म दिया।२।

 माता ही तो सहने वाली निज
 रक्त पिला शिशु बड़ा किया।
 निज तनय को सूखे में रखकर
 खुद रात-रात रत जगा किया।३।

 खुद आधे पेट भी खा करके
 माता ने शिशु को पुष्ट किया।
 नित लात सही नन्हें शिशु की
 फिर भी न उसको रुष्ट किया।४।

 माता धरती माता माता
 गौ माता ही बस माता हैं।
 ये तीनों ही हैं सहनशील
 जिससे यह जग चल पाता है।५।

 माता के स्नेहसुधामृत से
 बच्चों का पोषण होता है।
 होते हैं बच्चे हृष्ट पुष्ट
 जब माँ का आँचल होता है।६।

 माता का कहीं विकल्प सुनो
 ना जग में संभव होता है।
 माता की गोदी में ही तो
 शिशु निर्भय होकर सोता है।७।

 ईश्वर भी माँ की ममता को
 पाने इस धरा पे आते हैं।
 कभी राम बने कभी कृष्ण सखा
 माता की गोद में जाते हैं।८।

 है धरा धन्य इस भारत की
 मातायें पूजित सदा सचर।
 माताओं के बल से ही
 हैं हुये कोटिशःवीर अमर।९।

   अवनीश
💐💐🙏🙏

देवी स्तुति

 सन्तन के मुनिवृन्दन के मतिमान जनों के दुख हरती हो।

शीश विराजत छत्र चँवर उन राजन की रक्षा करती हो।।
दास खड़ा तव द्वार समर्पित भाव स्वभाव दया करती हो।
मोहि पुकारत देर भई जगदम्ब बिलम्ब कहाँ करती हो।१।

मातु त्वदम्ब कृपा मिलने से समस्त अमङ्गल होत सुखारो।
दीन दु:खी जन की हो महेश्वरि तारिणी हारिणि भक्त पुकारो।
रक्ष सुरेश्वरि दीनन की हो सदा अवलम्ब बिलम्ब को टारो।
मोहि पुकारत देर भई जगदम्ब विपत्ति हरो अब सारो।२।

अवलम्बन हो तुम दीन जनों की समस्त विपत्ति को माँ हरती हो।
हो तुम ही जगदम्ब आकाश पाताल समेत धरा धरती हो।।
नाम जपे तव ध्यान धरे से समस्त निवारण होत विकारो।
माँ जगदम्ब कृपा करके यह रोग हरो अब संकट टारो।३।

  अवनीश
💐💐🙏🙏



कोरोना

 हे ईश्वर इस कोरोना ने दारुण दिन यह कैसा लाया,

तड़प रहा इन्सान धरा पर छटती धूप न मिलती छाया।
जीवन है क्षणभंगुर पर न इतना सरल फिजूल रहा,
देख रहा हूँ आज जहाँ भी मरते लोग,है मौत का साया।।

रोवत बालक लिपटि के तन से रोती नार परान पिया रे
रोग लगा है कौन सा तुमको जतन करें हम कैसो दु:खारे।
लोगन के नहि मिलत दवाई डॉ हुए हैं बेबस सारे
बड़ बड़ लोगन जाई रहे हैं भर्ती नहि होवत लोग पुकारे।।

ऑक्सीजन जन को नहि मौसर अस्पताल बेहाल हैं सारे
रात दिवस थकि रहे चिकित्सक होवत हैं सब पस्त बेचारे।
लूट पड़ी अब कृत्रिम श्वांस की श्वांस मिलै तब स्वांस उबारें
हाय सहाय बनो जगदम्ब सुनो अब जीवन तोरे सहारे।।

  अवनीश
💐💐🙏🙏

ग़ज़ल

 1222,1222'1222,1222

 बहुत ही भाग्यशाली लोग जो खुशियाँ लुटाते हैं         किया करते हैं सेवा माँ-पिता पर जाँ लुटाते हैं।

 बहुत प्यारे हैं वो बेटे जो माँ की फिक्र करते हैं
 यहीं है वास्तविक अपवर्ग जो बेटे दिलाते हैं।

 बढाया है पिता ने सन्तति खुद को तपा करके
 वहीं पी दूध माँ के ही शिशु फिर दौड़ पाते हैं।

 नहीं उन्नृण कभी भी हो सकेंगे कर्ज से उनके
 हमें माता-पिता हरदम विपत्ति से बचाते हैं।

 फटी जो पाँव में रहती बेवाई बाबू जी के है
 कड़ी मेहनत पसीने से ही बच्चे पाले जाते हैं।

 यहाँ घर में सभी मायें किया करती जतन लाखों
 तभी बच्चे सदा माँ से मधुरतं भोज्य पाते हैं।

 इसलिये हैं सभी कहते कि महिमा है बहुत न्यारी
 इसी जीवन में बन ईश्वर स्वयं माँ बाप आते हैं।।
   
    अवनीश                                                           💐💐🙏🙏


मन की व्यथा

मन व्यथित है हो रहा नित देखकर हालात को

कौन ऐसा है जो घबराता नहीं दिन-रात को?।
है बहुत दारुण घड़ी आयी जगत् में काल बन
छा रहा तम,धैर्य से वश में करो हालात को।१।

जो विपत की इस घड़ी में धैर्य की नौका चढ़े
मन वचन निज कर्म से सन्मार्ग पर आगे बढ़े।
है वही सच्चा तपस्वी है मनस्वी व्यक्ति वो
इस कोरोना की महामारी में घर पर जो पड़े।२।

गर बुरा है दौर ये अच्छा भी तो फिर आयेगा
बीतता हर पल यहाँ तो यह कहाँ टिक पायेगा।
माना के है दौर ये मुश्किल भरा अतिशय विकट
सब्र से दो चार कर लो धुंध ये कट जायेगा।३।

हर मुसीबत की घड़ी में इम्तेहाँ होता ही है
स्वर्ण भी तपता है पिटता तो चमक पाता भी है।
सूर्य तपता है अधिक तो चाँदनी सी रात होती
हर परीक्षा के अनन्तर व्यक्ति सुख पाता ही है।४।

हे मनुज इस वक्त घर में रह तपस्या तुम करो
हो जरूरत गर बहुत तब ही कदम बाहर धरो।
यह विपत की है घड़ी यह आप ही टल जायेगी
बस जरा संभलो न इसके ग्रास तुम हरगिज बनो।५।

नीति कहती है कि जब हो घोर अंधेरा घना
हर जगह हरवक्त अनहोनी का हो पहरा बना।
तब जरा सा खुद के कदमों को स्थगित करना भला
है समय का फेर यह फिर से सुबह नव कब मना।६।

धैर्य ही तरणी है विपदा में सदा धारण करो
हो मनस्वी अब जरा सा सर्व साधारण सरो।
चेन तोड़ो अब कोरोना का न यह आगे बढे
बन सजग प्रहरी घरों में ही रहो धीरज धरो।७।

अवनीश
💐💐🙏🙏


पर्यावरण-संकल्प

पर्यावरण सुरक्षित हो अब यह संकल्प हमारा हो      प्रकृति प्रेम निःस्वार्थ करें सब यह नित ध्येय हमारा हो।

नदियाँ झरने झील तलाब दिया है सब कुछ प्रकृति ने।
पेड़ वनस्पति जड़ी बूटियां सब कुछ किये हैं सुकृति ने।
फिर हम क्यूँ हैं फिरते मारे नाता बना हमारा हो।      प्रकृति प्रेम निःस्वार्थ करें सब ...........।१।

प्रकृति माता पालन करती उससे जो जुड़ जायें हम।
जीव-जन्तु सब आवश्यक हैं उनका मान बढायें हम।
इस धरती पर हक़ है सबका जीव मात्र का नारा हो।
प्रकृतिक प्रेम निःस्वार्थ करें सब........।२।

पेड़ पौध हरियाली गहना धरती माँ के ये सब हैं
जैसे जीवन हममें तुममें ऐसे ही इन सबमें है।
देते हैं नित स्वच्छ वायु जल वर्षा के भी कारक हैं।    इनका संरक्षण कर मानव जीवन सफल तुम्हारा हो।
प्रकृति प्रेम निःस्वार्थ करें सब.....।३।

वृक्ष लगायें नदी बावड़ी पर्वतादि ना दूषित हों
कार्बन उत्सर्जन अति कम हो नदियाँ नहीं प्रदूषित हों।
स्वच्छ वायु औ नीर को जन नs भटके कभी बेचारा हो।
प्रकृति प्रेम निःस्वार्थ करें सब......।४।

कोशिश हो हम सबकी सारी वृक्षारोपण करें अनेक
जन अभियान रहे तन मन से स्वार्थ रहित हों कर्म भी नेक।
हर उत्सव में हम सबका बस यह उद्देश्य पियारा हो
प्रकृति प्रेम निःस्वार्थ करें सब.......।५।

   अवनीश
💐💐🙏🙏

जूता

 जूते की अपनी कथा अलग                               जूते की अपनी व्यथा अलग।                             जूते से रोब झलकता है                                   जूता क्या खूब मटकता है।१।

जूते में सब गुण ही गुण हैं
अवगुण नित दूर करे गुण है।
हर मर्ज की होती दवा जहाँ
हम उसको जूता कहते हैं।२।

यह जूता पाँव बचाता है
पथ कंटक से लड़ जाता है।
जब ठोकर लगती जीवन में
जूता सन्मार्ग दिखाता है।३।

घर में जिसने खाया जूता
बचपन से जो पाया जूता।
बाबू जी से बाबा जी से
जो जूता खाये जग जीते।४।

है खुलती दिव्य चक्षु जन की
जब जूते की है डर दिखती।
बालक होता है परं सजग
जब जूते की आहट मिलती।५।

हम भारतवासी जन-जन का
विस्वास अटल है जूते में।
गुरुजन से मिलता शुभाशीष
जूते जब पड़ें महीने में।६।

इसलिये कह रहा मैं सुनिये
जूते को सर्वोपरि गिनिये।
जूता ही तो पथ दर्शक है
हम सबके भी अनुभव सुनिये।७।

   अवनीश
💐💐🙏🙏





प्रिये

तुमसे जीवन का प्यार प्रिये                                        है हरा भरा घर-द्वार प्रिये।                                      तुमसे ही तो है बना हुआ                                      जीवन उपवन संसार प्रिये।१।

तुम रहती स्वांसों में बंधकर
दिलधड़कन बनी धड़कती हो।
हर वक्त हमारे हित खातिर
प्रियतमा रात दिन अड़ती हो।२।

तुम बिन जीवन बेकार प्रिये
था बिखरा सा घर बार प्रिये।
जब से संग पाया है तेरा
अब जगमग है संसार प्रिये।३।

महिमा तेरी महिमा अद्भुत
जग से न्यारी मनुहार प्रिये।
तुम अडिग मुसीबत में रहकर
करती जीवन साकार प्रिये।४।

तेरे अधरों की हँसी मुझे
देती नित नई बहार प्रिये।
तेरे कपोल प्रिय दन्तावलि
है दाड़िम सी उपहार प्रिये।५।

तुम अंतर्मन की शक्ति हो
गुरु मातु पिता की भक्ति हो।
रहती मुझमें बन शक्ति परं
पथ दर्शक बारम्बार प्रिये।६।

   अवनीश
💐💐🙏🙏



पुष्प

यह पुष्प करे मन को पुष्पित
करता नित मन को आकर्षित।
है अपरम्पार सदा इसकी
गुण महिमा आदि करे हर्षित।१।

यह कोमल सुन्दर पुष्पित हो
जनमन को नित सुरभित करता।
आकर्षक ऐसा पुष्प सदा जो
जीव मात्र का चित हरता।२।

भौरे मधुमक्खी सहित सभी
तितली तक पुष्प निरखती हैं।
लेकर पराग इन पुष्पों से
जीवन आनन्दित करती हैं।३।

इन फूलों की महिमा देखो
अमृत सम मधु के कारक हैं।
ये पुष्प प्रभो के दिये हुये
वरदान सदा उपकारक हैं।४।

इनकी ही कृपा से सजती है
हर सभा हैं, होते आयोजन।
फूलों से होते देवार्चन
फूलों से मङ्गल संयोजन।५।

फूलों से ही आरम्भ सदा
होता है अन्त भी फूलों से।
अनुपम उपहार हैं धरती के
विचलित नहि होते शूलों से।६।

ये मन को सुमन किया करते
अत एव सुमन पद वाचक हैं।
हर मन मन्दिर कर देते हैं
ये सरल हृदय आह्लादक हैं।७।

अवनीश
💐💐🙏🙏



महँगाई गीत

हम सबको ही महंगाई यह निश दिन बहुत रुलाये       क्या-क्या करके कैसे अब यह मानव दर्द भुलाये?


चार काम सोचो करने को दो में निकला जाये दम।
आटा है तो दाल नहीं है चावल है तो चीनी कम।
सब्जी हरी औ छौंक हैं भूले आलू प्याज कहाँ हैं कम?
गई नौकरी जिनकी पूँछो जीते हैं बस क्या ये कम?
फिर भी ये महँगाई डायन मुँह को बाये जाये।
हम सबको ही महंगाई यह निश दिन बहुत रुलाये ।१।

कोरोना का कहर था कम क्या मँहगाई है आयी?
घोर निराशा कोरोना में जो थी गहरी छाई।
जैसे तैसे बचे मनुज महँगाई शामत लायी।
कोरोना से राहत मिली ही थी ली सुरसा ने अँगड़ाई।
जायें कहाँ जियें कैसे जब रोटी पर बन आये।
हम सबको ही महंगाई यह निश दिन बहुत रुलाये ।२।

कितने बच्चे हुये अनाथ हैं माँ से गये हैं कितने दूर।
कितनी बहनों ने भाई खोये सतियों के मिट गये सिन्दूर।
गयी नौकरी लोगों की कर गये पलायन तक मजदूर।
अस्पताल सब हुये विवश आक्सीजनकिल्लत थी भरपूर।
हाथ मसलते रहे स्वजन जन रुपया ले ले धाये।
हम सबको ही महंगाई यह निश दिन बहुत रुलाये ।३।

उसी घाव को ताज़ा कर मँहगाई दर्द बढ़ाये।
बचा हुआ मानव भी चिंतित कैसे जीये खाये?
छोटे बच्चे घर में दुबके डर से निकल न पाये।
उनकी छोटी सी मांगों पर कसक बढी ही जाये।
मँहगाई तूँ कैसी निर्मम कैसे दिन हैं आये?
हम सबको ही महंगाई यह निश दिन बहुत रुलाये ।४।

प्रकृति कुपित है स्थिति विकट है नटवर तुम्हीं सहारा दो।
निज कर्मों के भँवर फँसे हैं छोड़ो नहीं उबारा दो।
मन अशान्त विश्रान्ति को पाये ऐसा सुखद नज़ारा दो।
परिस्थिति अब बने सुकर प्रभु गीता ज्ञान दुबारा दो।
मन निर्मल हो जन-जन का सत्कर्म मार्ग पर जाये।
हम सबको ही महंगाई यह निश दिन बहुत रुलाये ।५।

   अवनीश
💐💐🙏🙏

माटी

माटी के पुतले हैं हम सब

माटी का नित वन्दन है।
माटी देश की थाती है
माटी का अभिनन्दन है।१।

इस माटी से बने सभी
इस माटी में ही मिलते हैं।
ईश्वर माटी के सुख खातिर
एक दिन माटी के बनते हैं।२।

माटी ही तो माता है निज
कोख में पाले जन-जन को।
माटी ही स्वर्णिम शक्ति है जो
प्रेरित करती तन मन को।३।

यह परं भाग्य है हम सबका
इस माटी के आयें काम।
हम भारतवासी माटी को
करते हैं शतकोटि प्रणाम।४।

यह देश प्रमुख है यह भी तो
इस माटी के ही कारण है।
इसकी रक्षा को वीर सदा
करते अतिव्रत को धारण हैं।।

है तिलक हमेशा माटी का
सबके गौरव का दायक है।
माटी को गले लगा कर ही
हुये कई जननायक हैं।६।

निज जन्म भूमि की माटी के
आगे हर सुख बौना है।
रावण की स्वर्णिम नगरी भी
साकेत के आगे औना है ।७।

   अवनीश
💐💐🙏🙏

मित्र

मित्र होता है वही जो हर मुसीबत में खड़ा हो              साथ देता है सदा वो वक़्त जितना भी बुरा हो।।          दोस्ती होती नहीं है फायदे को देखकर                      दिल के मिलने पर स्वयं दोस्ती का सिलसिला हो।१।


है यही रिश्ता जो रिश्तों से बड़ा मजबूत है।
दोस्ती दो व्यक्तियों की भावना का सबूत है।
होते हैं रिश्ते स्वयं पर मित्रता को हम करें।
मित्रता में दो हृदय ही मित्र के मिलकर बढें।२।

मित्रता होती अलग ही एक जोड़ी व्यक्तियों की।
मित्रता से राह खुलती हर घड़ी नवशक्तियों की।
मित्र देता है सहारा हर मुसीबत में स्वयं ही।
मित्रता है औषधि हर शोकपीड़ित भुक्तियों की।३।

मित्रता है कृष्ण जी की जो सुदामा को उबारे।
मित्र की बाधा हरे हरदम करे सब यत्न सारे।
मित्रता प्रभु राम की सुग्रीव के जो दुःख निवारे।
मित्रवत्सल राम जी के प्रिय अतिथि थे मित्र सारे।४।

मित्रता का मोल कोई भी कहीं चुकता करे?
मित्रता की डोर हरदम यकीं पर टिका करे।
मित्रता है ईश की अनुपम सुगमतम लेन है।
मित्रता तो विश्व की सबसे मनोहर देन है।५।

   अवनीश
💐💐🙏🙏






दोहा गीत

करता हूँ गुरु नाम जप मन में आठों जाम।।              जीवन को जो नित्यशःकरते प्रतिपल धाम।।

मिट्टी के कच्चे घड़े होते शिष्य अजान।
देते गुरु सन्मार्ग से उत्तम जीवन ज्ञान।
सिद्ध सदा गुरुदेव से जीवन के सत्काम।1।

शिष्य पुत्र सम लोक में रहता गुरु के पास।
शिष्य गुरु के स्नेह से बढ़ता दृढ विश्वास।
पाते हैं सब शिष्यगण जग में अद्भुत नाम।2।

जीवन सफल बने सदा गुरु हैं सकल निधान।
शिष्यों से जो सर्वदा कहते कर्म विधान।
जगदीश्वर के रूप गुरु विपदा लेते थाम।।3

कहते हैं गुरु ब्रह्म हैं गुरु ही विष्णु महान।
गुरु ही तो शिव हैं स्वयं गुरु ही परम सुजान।
गुरु ही हैं गुरुतर बहुत गुरु ही सब आयाम।4।

गुरु ही हैं रवि-चन्द्र सम गुरु ही पवन समान।
गुरु ही तो करते सकल दूर सतत अज्ञान।
गुरु के ही श्रीचरण शुभ करते मङ्गल काम।5।

मुझ पर भी गुरु जी सदा करिये दया आपार।
बिन गुरुदेव दया कहो शिष्य कहाँ भवपार।
प्रणति करत अवनीशधर गुरु ही पूर्ण विराम।6।

   अवनीश
💐💐🙏🙏

ग़ज़ल

उनकी चाहत में मैं इतराने लगा।                              प्यार में पागल नज़र आने लगा।।

है किसी का दोष हरगिज भी नहीं
इश्क़ का मुझपर नशा छाने लगा।।

उनकी यादों को बना कर हमसफ़र
प्यार की मञ्ज़िल को मैं पाने लगा।।

आशिकी भी चीज क्या से क्या करे
हर घड़ी वो ही नज़र आने लगा।।

कोई भी ग़म हो मुझे या हो ख़ुशी
यादों में उसकी सुकूँ पाने लगा।।

क्या इसी को इश्क़ मैं भी मान लूँ
देख कर वो मुझको शर्माने लगा।।

क्यूँ भला देखूँ फलक की ओर मैं
चाँद धरती पर नज़र आने लगा।।

है अलग ही चाह दिल में बस गयी
दोस्तों अवनीश मुस्काने लगा।।

अवनीश
💐💐🙏🙏


बोलना चाहेंगे

दिल में जो छुपाया है बोलना चाहेंगे।                         उसे दिल से मिटाया है बोलना चाहेंगे।

करेंगे जतन मिटादें उसकी यादों को
उसे हमने भुलाया है बोलना चाहेंगे।

वो हरगिज़ न रहेगा यादों में मिरी
याद बनके सताया है बोलना चाहेंगे।

बड़ा गुरुर था उसे मुझे अपने प्यार पर
हालात ने मिटाया है बोलना चाहेंगे।

फलक के चाँद से बातें किया रातें जगी मैंने
माहताब भी शर्माया है बोलना चाहेंगे।

अच्छा सिला दिया है मेरे यार ने मुझे
जो भी खोया पाया है बोलना चाहेंगे।

दुनियादारी भी होती है क्या खूब अवनीश
अपनों ने सितम ढाया है बोलना चाहेंगे।

जहाँ में कुछ यहाँ रख्खा नहीं है दोस्तों सुनों
हर इक चाह ने तड़पाया है बोलना चाहेंगे।

सुब्ह शाम सातों दिन है दररोज का चक्कर
पेट पीठ तक सट आया है बोलना चाहेंगे।

बुरा वक़्त है हालात बुरा कौन चाहता
अपना भी हुआ पराया है बोलना चाहेंगे।

  अवनीश
💐💐🙏🙏

अगर रोक लेते

मैं खुद मान जाता अगर रोक लेते।          

ये दिल मुस्कुराता अगर रोक लेते।

तुम्हारे बिना जिंदगी थी अधूरी
जिया चैन पाता अगर रोक लेते।

मुझे दूर तक की पड़ी भी कहाँ थी
न फूला समाता अगर रोक लेते।

कहूँ भी तो कैसे के तुम तो बुरे हो
नहीं दिल रुलाता अगर रोक लेते।

सुहाना सफर ज़िन्दगी का हो जाता
मैं खुद हार जाता अगर रोक लेते।

न पीता जुदाई जहर जिन्दगी में
न दिल कस्मसाता अगर रोक लेते।

पड़ी तेरी राहों में खुशियाँ भी होतीं
न दिल ये सताता अगर रोक लेते।

मेरी ज़िंदगी में भी खुशियाँ समातीं
तुम्हें क्यों भुलाता अगर रोक लेते।

बड़ा दर्द है दिल की सुनने में यारों
न बाहर ये आता अगर रोक लेते।

जो पायी है मैंने जगह ज़िन्दगी में
कहाँ से वो पाता अगर रोक लेते।

कभी बातें करता जो अवनीश खुदसे
न वो कोसा जाता अगर रोक लेते।।

अवनीश
💐💐🙏🙏

अगर रोकते वो

मैं खुद मान जाता अगर रोकते वो
ये दिल मुस्कुराता अगर रोकते वो।

थी उनके बिना जिंदगी ये अधूरी
जिया चैन पाता अगर रोकते वो।

मुझे दूर तक की पड़ी भी कहाँ थी
न फूला समाता अगर रोकते वो।

कहूँ भी तो कैसे के वो हैं बुरे से
नहीं दिल रुलाता अगर रोकते वो।

सुहाना सफर ज़िन्दगी का हो जाता
मैं खुद हार जाता अगर रोकते वो।

न पीता जुदाई जहर जिन्दगी में
न दिल कस्मसाता अगर रोकते वो।

पड़ी उनकी राहों में खुशियाँ भी होतीं
न दिल ये सताता अगर रोकते वो।

मेरी ज़िंदगी में भी खुशियाँ समातीं
उन्हें क्यों भुलाता अगर रोकते वो।

बड़ा दर्द है दिल की सुनने में यारों
न बाहर ये आता अगर रोकते वो।

जो पायी है मैंने जगह ज़िन्दगी में
कहाँ से मैं पाता अगर रोकते वो।

कभी बातें करता जो अवनीश खुदसे
न वो कोसा जाता अगर रोकते वो।।

अवनीश
शिवगङ्गा वसुन्धरा
०५/७/२०२१
💐💐🙏🙏









 

ग़ज़ल

दिल की राहों से आकर गुजरते हुये                  प्यार को हमसे पाकर गुजरते हुये।

वो अक्सर ही खुद को भुला बैठते
नैन मुझसे मिलाकर गुजरते हुये।

देखते हैं कहीं दिल में होती कसक
सबसे बातें बनाकर गुजरते हुये।

मुझी पे निगाहें टिकीं रहतीं उनकी
नज़ाकत दिखाकर गुजरते हुये।

इशारों इशारों में बातें बनाते हैं
खुद को छुपाकर गुजरते हुये।

इधर भी कसक है कसक है उधर भी
नज़र को बचाकर गुजरते हुये।

हया रूप की सबसे महँगी है चादर
खुद को रखते सज़ाकर गुजरते हुये।

यहाँ लोग खुद के ही दुःख से परेशान
चलते नजरें गड़ाकर गुजरते हुये।

मर गयी है जहाँ में मनुजता हो जैसे
लूटते हैं डराकर गुजरते हुये।

क्या क्या होता नहीं है यहाँ रातों दिन
ठगते उल्लू बनाकर गुजरते हुये।

देख रोता है दिल अब तो अवनीश का
मार देते बुलाकर गुजरते हुये।।

अवनीश
शिवगंगा
07/07/2021









व्रजरसमाधुरी

 मद्धम मद्धम पवन बहत नित रहत सुगंध लुटाई डाली डाली झूमत निसदिन लेत रहत अंगड़ाई। शुक सारिक डालिन पर निवसत रहत मंद मुसुकाई भागि सुभागि भयो अवन...