रविवार, 18 जुलाई 2021

मन की व्यथा

मन व्यथित है हो रहा नित देखकर हालात को

कौन ऐसा है जो घबराता नहीं दिन-रात को?।
है बहुत दारुण घड़ी आयी जगत् में काल बन
छा रहा तम,धैर्य से वश में करो हालात को।१।

जो विपत की इस घड़ी में धैर्य की नौका चढ़े
मन वचन निज कर्म से सन्मार्ग पर आगे बढ़े।
है वही सच्चा तपस्वी है मनस्वी व्यक्ति वो
इस कोरोना की महामारी में घर पर जो पड़े।२।

गर बुरा है दौर ये अच्छा भी तो फिर आयेगा
बीतता हर पल यहाँ तो यह कहाँ टिक पायेगा।
माना के है दौर ये मुश्किल भरा अतिशय विकट
सब्र से दो चार कर लो धुंध ये कट जायेगा।३।

हर मुसीबत की घड़ी में इम्तेहाँ होता ही है
स्वर्ण भी तपता है पिटता तो चमक पाता भी है।
सूर्य तपता है अधिक तो चाँदनी सी रात होती
हर परीक्षा के अनन्तर व्यक्ति सुख पाता ही है।४।

हे मनुज इस वक्त घर में रह तपस्या तुम करो
हो जरूरत गर बहुत तब ही कदम बाहर धरो।
यह विपत की है घड़ी यह आप ही टल जायेगी
बस जरा संभलो न इसके ग्रास तुम हरगिज बनो।५।

नीति कहती है कि जब हो घोर अंधेरा घना
हर जगह हरवक्त अनहोनी का हो पहरा बना।
तब जरा सा खुद के कदमों को स्थगित करना भला
है समय का फेर यह फिर से सुबह नव कब मना।६।

धैर्य ही तरणी है विपदा में सदा धारण करो
हो मनस्वी अब जरा सा सर्व साधारण सरो।
चेन तोड़ो अब कोरोना का न यह आगे बढे
बन सजग प्रहरी घरों में ही रहो धीरज धरो।७।

अवनीश
💐💐🙏🙏


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