रविवार, 14 अप्रैल 2024

ग़जल

 


ख़मोशी झाँकती है खिड़कियों से

गली में शोर सा फैला हुआ है।


नहीं दिखता है बाहर शख्स कोई

शहर वीरान सा मैला हुआ है। 


कहाँ कोई किसी का इस जहाँ में 

जमाना खुद पे ही लैला हुआ है ।


नहीं है काम फिर भी व्यस्त हैं सब

चुनावी आज ही रैला हुआ है।


दिखाये ख्वाब ऐसे वायदों के

कि मन हर शख्स का छैला हुआ है।


रहा सच कटु हमेशा इस जहाँ में 

चुनाओं में गरम थैला हुआ है।


धरो धीरज जरा अवनीश मन में

ज़माना स्वार्थ पर छैला हुआ है।।

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