हैं हमारे ही स्वजन मजदूर जिनका नाम है।
हर तरक्की में सदा दिखता उन्हीं का काम है ।
उनके बल पर ही चले तो शहर विकासित हो गये
और उन शहरों में जाने कर्मठी कब खो गये।
है बड़ा ऋण आज शहरों पर हमें है सोचना
जिनके दम से राह तय की उनकी क्यूँ आलोचना।
यह दिवस उनको समर्पित करके क्या पाएंगे हम
उनके ऋण से मुक्त क्या सोचो कभी हो जाएंगे हम?
सच में उनको चाहते हैं हम सभी कुछ दें अगर
स्नेह से उनकी करें हम सब सदा मिल वंदना।
जो परिश्रम के बदौलत करते हैं मुमकिन सदा
लक्ष्य उनसे कब रहा है दूर उनकी यह अदा।
वो भी खुश होकर रहें न हो उन्हें कुछ वेदना
हम सभी शहरी जनों में हो अधिक संवेदना।
उनका जीवन भी बने उन्नत हमारे ही नगर सा
हैं ये ही मजदूर जिनसे हो रही सच कल्पना।
काम कर मजदूर माँगे अपनी मजदूरी जभी
स्नेह और सम्मान पूर्वक दें न हो दूरी कभी।
हैं सदा सम्मान के हक़दार ये श्रम के बली
पत्थरों में हैं ये करते प्राण का संचार भी।।
✍️अवनीश
शिवगंगा
०१/०५/२०२४
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें