रविवार, 18 जुलाई 2021

ग़ज़ल

दिल की राहों से आकर गुजरते हुवे                                          प्यार को हमसे पाकर गुजरते हुवे।

वो अक्सर ही खुद को भुला बैठते
नैन मुझसे मिलाकर गुजरते हुवे।

देखते हैं कहीं दिल में होती कसक
सबसे बातें बनाकर गुजरते हुवे।

निगाहें मुझी पे टिकीं रहतीं उनकी
नज़ाकत दिखाकर गुजरते हुवे।

इशारों इशारों में बातें बनाते हैं
खुद को छुपाकर गुजरते हुवे।

इधर भी कसक है कसक है उधर भी
नज़र को बचाकर गुजरते हुवे।

हया रूप की सबसे चादर है महंगी
खुद को रखते सज़ाकर गुजरते हुवे।

यहाँ लोग हैं अपने दुःख से परेशां
चलते नजरें गड़ाकर गुजरते हुवे।

मर गयी है जहाँ में मनुजता हो जैसे
लूटते हैं डराकर गुजरते हुवे।

क्या क्या होता नहीं है यहाँ रातों दिन
ठगते उल्लू बनाकर गुजरते हुवे।

देख रोता है दिल अब तो अवनीश का
मार देते बुलाकर गुजरते हुवे।।

डॉ०अवनीश
   शिवगङ्गा
०७/०७/२०२१









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