ये दिल मुस्कुराता अगर रोकते वो।
थी उनके बिना जिंदगी ये अधूरी
जिया चैन पाता अगर रोकते वो।
मुझे दूर तक की पड़ी भी कहाँ थी
न फूला समाता अगर रोकते वो।
कहूँ भी तो कैसे के वो हैं बुरे से
नहीं दिल रुलाता अगर रोकते वो।
सुहाना सफर ज़िन्दगी का हो जाता
मैं खुद हार जाता अगर रोकते वो।
न पीता जुदाई जहर जिन्दगी में
न दिल कस्मसाता अगर रोकते वो।
पड़ी उनकी राहों में खुशियाँ भी होतीं
न दिल ये सताता अगर रोकते वो।
मेरी ज़िंदगी में भी खुशियाँ समातीं
उन्हें क्यों भुलाता अगर रोकते वो।
बड़ा दर्द है दिल की सुनने में यारों
न बाहर ये आता अगर रोकते वो।
जो पायी है मैंने जगह ज़िन्दगी में
कहाँ से मैं पाता अगर रोकते वो।
कभी बातें करता जो अवनीश खुदसे
न वो कोसा जाता अगर रोकते वो।।
अवनीश
शिवगङ्गा वसुन्धरा
०५/७/२०२१
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