रविवार, 18 जुलाई 2021

ग़ज़ल:-2122 2122 2122 212

  मेरी सारी हसरतें इन वादियों में कैद हैं।।                       और चाहत की चिरैया घोंसलों में कैद है।

 चाह लो सच का उजाला हर गली रोशन करे               इस जहाँ में अस्लियत बस भाषणों में कैद है।

 हम चले थे जिन्दगी को प्यार का देने सिला                 ग़म यहाँ हर शख्स का उसके दिलों में कैद है।

भीड़ है हर ओर मेरे देख लो चाहे जिधर                    फिर यहाँ हर शख्स क्यूँ तन्हाइयों में कैद है।

जिंदगी मानों ये मेरी हो रही मुझसे ख़फ़ा।                  अब तो सबकुछ वक़्त की ही गर्दिशों में कैद है।

दर्द सबको है दिया क्या खूब कोविड ने यहाँ        आजकल हर आदमी खुद के घरों में कैद है।

रोज आता है तसव्वुर रहगुजर पर चल पड़ें                  सौ बहाने हैं अना के बन्धनों में कैद हैं।

  अवनीश                                                                💐💐🙏🙏      




कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

व्रजरसमाधुरी

 मद्धम मद्धम पवन बहत नित रहत सुगंध लुटाई डाली डाली झूमत निसदिन लेत रहत अंगड़ाई। शुक सारिक डालिन पर निवसत रहत मंद मुसुकाई भागि सुभागि भयो अवन...