हम वाणी जन हैं वाणी के कवि आलेखक हैं कलमकार। मन जिनके निर्मल कोमल से बहती निर्झर करुणा आपार।
संतप्त हृदय की आशाओं का करते हैं सम्मान सदा। जो दीन-हीन दुखियारे हैं उनके रहते अभियान सदा।
जिनकी वाणी में द्रवित यहाँ होता है बल नित अबला का। जिनकी चर्चा में दुःख रहता नित सीता-गीता विमला का।
जिनकी कलमों की बारूदें उन दुष्ट पिशाचों को रौंदे। जिनके शब्दों के स्फोट सदा नित कंस दशानन को कौंधे।
हम उन्हीं ऋषी कुल के चारी जद में रहते अत्याचारी। नहीं वैर भाव वाणीन्द्रों का ना देखी जाती लाचारी।
हर बार क्यूँ पिसती बेचारी? दर दर भटके जनता सारी।। क्यूँ मौज में रहते व्यभिचारी? क्यूँ पीर से कृषकों की यारी?
क्यूँ मेहनत की रोटी भारी? उद्योगों में भी बीमारी। निज खून पसीना बहा रहे मजदूरों की किस्मत मारी?
क्या कहूँ मैं कितना वाणी का साधक हूँ मैं है अनल बहुत। अवनीश हूँ कहता भरे कण्ठ यह परिपाटी है गरल बहुत।
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