जुगों से मैं भी हूँ प्यासा मुझे जी भर के पीने दो।
नयन के अश्रु मत रोको सुधा की धार पीने दो।
सजल दोनों नयन क्यूँ हैं? जहाँ अमृत उदधि भी है।
जरा उसपार जाने दो मुझे आकंठ पीने दो।
निराशा को बदल आशा में नित विश्वास को लाओ।
जरा ठहरो मेरे यारों नई ऊर्जा संजोने दो।
यही है तंग हाली चार दिन की मेहमा खाली।
इसे करदो विदा होकर फिदा तुम मस्त हो जाओ।
चलो झूमों उठो उत्साह से लबरेज हो जाओ।
करो विश्वास खुद के साथ उठो फिरसे चलो धीरे।
मिलेगी राह हर वो चाह हम जिसको नहीं भूले।
करेगी खुद वरण स्वर्णिम सफलता खुद हमें छूले।
जरा उत्साह से एक आश की फिर रौशनी लाओ।
जुगों से हूँ मैं भी प्यासा मुझे ना और तड़पाओ।
अवनीश 19/4/2020
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें