जिस सुखद पल को जिया हूँ दर्द जीवन का पिया हूँ। उस कमी के वक़्त में भी जिस लगन से मैं जिया हूँ।
उस गरीबी में अमीरी थी हमारी उन दिनों। सर पे साया माँ के आँचल का था एक वरदान सा।
मैं था नन्हा सा क्षितिज पर माँ का था अभियान सा। माँ की मीठी लोरियों में इक सुधा थी जहान था।
उसकी नयनों का था तारा छोटा सा संसार सारा। माँ के हाथों की वो रोटी प्यार से उसको वो पोती।
उस परम अमृत के आगे आज का वैभव बेचारा। भाव के ही अभाव में न स्वाद आता हूँ बेचारा।
लाख व्यंजन हूँ मैं खाता पर ललक न ढूंढ पाता। माँ के आँचल का जो सुख था वह नहीं मिलता दुबारा।
अब तो बस यादों की रचना से ही उसमें है सिमटना। माँ तूँ तो अपरम्पार है तेरे बिना क्या सार है।
जीवन वृथा संसार है माँ तूँ सुखद तुँ अपार है। माँ तूँ सरल अवतार है माँ तूँ ही बस संसार है।
अवनीश 💐💐🙏🙏
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