रविवार, 18 जुलाई 2021

महँगाई गीत

हम सबको ही महंगाई यह निश दिन बहुत रुलाये       क्या-क्या करके कैसे अब यह मानव दर्द भुलाये?


चार काम सोचो करने को दो में निकला जाये दम।
आटा है तो दाल नहीं है चावल है तो चीनी कम।
सब्जी हरी औ छौंक हैं भूले आलू प्याज कहाँ हैं कम?
गई नौकरी जिनकी पूँछो जीते हैं बस क्या ये कम?
फिर भी ये महँगाई डायन मुँह को बाये जाये।
हम सबको ही महंगाई यह निश दिन बहुत रुलाये ।१।

कोरोना का कहर था कम क्या मँहगाई है आयी?
घोर निराशा कोरोना में जो थी गहरी छाई।
जैसे तैसे बचे मनुज महँगाई शामत लायी।
कोरोना से राहत मिली ही थी ली सुरसा ने अँगड़ाई।
जायें कहाँ जियें कैसे जब रोटी पर बन आये।
हम सबको ही महंगाई यह निश दिन बहुत रुलाये ।२।

कितने बच्चे हुये अनाथ हैं माँ से गये हैं कितने दूर।
कितनी बहनों ने भाई खोये सतियों के मिट गये सिन्दूर।
गयी नौकरी लोगों की कर गये पलायन तक मजदूर।
अस्पताल सब हुये विवश आक्सीजनकिल्लत थी भरपूर।
हाथ मसलते रहे स्वजन जन रुपया ले ले धाये।
हम सबको ही महंगाई यह निश दिन बहुत रुलाये ।३।

उसी घाव को ताज़ा कर मँहगाई दर्द बढ़ाये।
बचा हुआ मानव भी चिंतित कैसे जीये खाये?
छोटे बच्चे घर में दुबके डर से निकल न पाये।
उनकी छोटी सी मांगों पर कसक बढी ही जाये।
मँहगाई तूँ कैसी निर्मम कैसे दिन हैं आये?
हम सबको ही महंगाई यह निश दिन बहुत रुलाये ।४।

प्रकृति कुपित है स्थिति विकट है नटवर तुम्हीं सहारा दो।
निज कर्मों के भँवर फँसे हैं छोड़ो नहीं उबारा दो।
मन अशान्त विश्रान्ति को पाये ऐसा सुखद नज़ारा दो।
परिस्थिति अब बने सुकर प्रभु गीता ज्ञान दुबारा दो।
मन निर्मल हो जन-जन का सत्कर्म मार्ग पर जाये।
हम सबको ही महंगाई यह निश दिन बहुत रुलाये ।५।

   अवनीश
💐💐🙏🙏

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