समझ गए हैं सब नर-नारी
करते चर्चा गहरी न्यारी।वृक्ष लगा हम जीवन पायें
प्रकृति संग हम सब मिल जायें।
बिना प्रकृति के विकृति सारी
हो अनुकूल प्रकृति हितकारी।
हरा-भरा जंगल दे जीवन
खूब लगाओ सब मिलकर वन।
वृक्ष करें सुखमय नित जीवन
शुद्धवायु देते नित उपवन।
ऋणी सदा प्रकृति के हैं हम।
जीवन सुगम बनाते हरदम।
आश्रय दाता वृक्ष ही सबके
जीवजन्तु सब रहते बसके।
मानव हों या हों पशु-पक्षी
प्रकृति प्रेम से धरती सजती।।
अवनीश
शिवगङ्गा
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