गुरुवार, 2 जुलाई 2026

मित्र

 स्नेहभाजन मित्र आपस में मिलें तो

स्नेह का सँचार बरबस हो ही जाता।

कौन है जो देख कर अपने सुहृद को

भाव विह्वल और गद्गद हो न पाता।१।


आप ही हैं शक्ति मेरी लेखनी की

आपकी ही प्रेरणाएं जीवनी की।

स्नेह का ही नाम तो कविता सुधा है

हो हृदय जब अद्रवित कविता वृथा है।२।


स्नेह ही इस सृष्टि की सारी कथा है

स्नेह से ही हम सभी की हर विधा है।

स्नेह के हैं हम ऋणी हरदम सुहृत

स्नेह से ही है जगद् बंधन विहित।३।


सात वारिधि पार भी है जो जहाँ

इस जहां में स्नेह का प्रत्येक लम्हां।

स्नेह की कविता है प्यासी हर घड़ी

स्नेह के मिलने से जुड़ती हर कड़ी।४।


जब कभी मानव हृदय का दर्द हो

व्यक्त करना आपका गर फर्ज हो।

सैर करते शब्द कवि के बुध्दिगत जो

व्यक्त करती लेखनी है भावना ।५।


स्नेह की वर्षा सुधा होती कभी

काव्य की पावन धरा सजती तभी।

स्नेह से होकर द्रवित ये काव्यधारा

कर रही पावन मनुज को दे सहारा।६।


डॉ० अवनीशधरद्विवेदी

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