गुरुवार, 2 जुलाई 2026

दिल्लीपुलिस

ये दिल्ली पुलिस हमारी है

करती सबकी रखवारी है।

भय भ्रान्ति मुक्त होवे दिल्ली 

हम सबकी जिम्मेदारी है ।१।

ये दिल्ली पुलिस हमारी है......


हाँ इसकी बात निराली है

ये जनता की रखवाली है।

मेहनत इसकी जग न्यारी है 

हो राष्ट्रपर्व का आयोजन 

हर तरफ दृष्टि दुःखहारी है।२।

ये दिल्ली पुलिस.....


निष्पक्ष पक्ष ना कोई है

जो अपराधी वो दण्डित है।

है दंड कठोर सदा इसका

अपराधीमन  है भय जिसका।

सबकी अपनी है प्यारी है

ये दिल्ली पुलिस हमारी है।३।


आबाल वृद्ध शोषित पीड़ित

जन की करती रखवारी है।

हर तरफ हमेशा सजग दृष्टि

हरदम ही पहरेदारी है।४।

ये दिल्ली पुलिस. .....


इक़बाल बुलंदी पर जिसका

संसद से सड़क गिरह उसका।

हो शांति समृद्धि दिल्ली में 

सत्संकल्पित ये भारी है।५।

ये दिल्ली पुलिस......


डॉ०अवनीशधरद्विवेदी

    💐💐🙏🙏


मित्र

 स्नेहभाजन मित्र आपस में मिलें तो

स्नेह का सँचार बरबस हो ही जाता।

कौन है जो देख कर अपने सुहृद को

भाव विह्वल और गद्गद हो न पाता।१।


आप ही हैं शक्ति मेरी लेखनी की

आपकी ही प्रेरणाएं जीवनी की।

स्नेह का ही नाम तो कविता सुधा है

हो हृदय जब अद्रवित कविता वृथा है।२।


स्नेह ही इस सृष्टि की सारी कथा है

स्नेह से ही हम सभी की हर विधा है।

स्नेह के हैं हम ऋणी हरदम सुहृत

स्नेह से ही है जगद् बंधन विहित।३।


सात वारिधि पार भी है जो जहाँ

इस जहां में स्नेह का प्रत्येक लम्हां।

स्नेह की कविता है प्यासी हर घड़ी

स्नेह के मिलने से जुड़ती हर कड़ी।४।


जब कभी मानव हृदय का दर्द हो

व्यक्त करना आपका गर फर्ज हो।

सैर करते शब्द कवि के बुध्दिगत जो

व्यक्त करती लेखनी है भावना ।५।


स्नेह की वर्षा सुधा होती कभी

काव्य की पावन धरा सजती तभी।

स्नेह से होकर द्रवित ये काव्यधारा

कर रही पावन मनुज को दे सहारा।६।


डॉ० अवनीशधरद्विवेदी

माँ

 माँ यह शब्द नहींं केवल

इस जग की माँ से काया है।

हम सबकी खातिर अतिपावन 

माँ के आँचल की छाया है।१।


माँ यह विषय अलौकिक है 

परब्रह्म जीव के जैसा ही।

माँ इस सृष्टि की अनुपम है

कारक ईश्वर है ऐसा ही।२।


माता बच्चों की होती है

पालक सर्जक शुभ सुखराशी।

माँ की गोदी में पलते हैं

अज विष्णु ईश प्रभु अघनाशी ।३।


हैं  शास्त्र सदा से ही कहते 

माँ की पद्वी सर्वोत्तम है।

माँ का स्नेहामृत पाने को

जग में आते पुरुषोत्तम हैं।४।


हैं कभी राम बलराम रूपधर

कृष्ण कन्हाई बन जाते।

माता की दिव्य अलौकिकता

पाकर परमेश्वर हर्षाते ।५।


माँ के गुण गौरव को शास्वत

श्रीराम कृष्ण नानक गाते।

जननी जन्मभूमि पावन 

श्री रामचन्द्र प्रभु बतालाते।६।


माँ की वत्सलता पाने को

चोरी कर कर माखन खाते।

माता का स्नेह निरन्तर हो

नित नया कांड कर घर आते।७।


माँ की वत्सलता पाने को

प्रभु ऊलूखल में बंध जाते।

हैं जग के जो पालन हारे

माँ माँ कह करके चिल्लाते।८।


माँ को हम सब दे सकते क्या 

माँ की सेवा नित करना है।

माँ की छाया नित बनी रहे 

सर्वोत्तम कर्म को वरना है।९।


माँ यह विषय गभीर अमिट 

सागर से जननी अधिकाई।

माता का पावन स्नेह मिले

जग में प्यारी है बस माई।१०।


माता की धैर्य धरा से ही

जग का पालन पोषण होता ।

मॉं दुःख सभी सह लेती है

सन्तति का दुःख दु:सह होता।११।


माँ खुद को भूल भाव से ही

निज सन्तति की सुध लेती है।

माता की स्नेहसुधा करुणा नित

अविरल पावन होती है।१२।


हम सबको भी माता ने ही 

अतिकष्ट सहन कर तार दिया।

था अति अभाव सद्भाव सिखाकर

माता ने उद्धार किया।१३।


शिक्षा के हेतु ममत्व त्यागकर

माँ ने दूर पठाया था।

हो चूर चूर पर धैर्य धरी 

माँ ने ही हमें बढ़ाया था।१४।


हम सब पढ़ लिखकर सक्षम हैं

बस माँ की कमी खटकती है।

माँ तुमको करके याद सदा

हम सबकी चाह अटकती है ।१५।


डॉ०अवनीशधरद्विवेदी

०९!०५/२०२६


समस्यापूर्तिः

 विज्ञानं सविमर्षकं वितनुते काव्यं सदा धीमता-

मानन्दं तनुते धियो वितनुते कल्लोलिनीसंगमः।

नानाकाव्यरसं तनोति सुखदश्चित्तप्रसादो वर

श्चेतस्तापमपाकरोतु सततं कल्लोलिनीयं सताम्।१।


काव्येन प्रसरन्ति कीर्तिविमला:काव्यं चमत्कारकं

काव्यं मानवतां तनोति विमलां बुद्धिं विधत्ते स्थिराम्।

आनन्दस्य महोत्सवो जगति वै जायेत शीघ्रं ध्रुवं चेतस्तापमपाकरोतु सततं कल्लोलिनी धीमताम् ।२।


सानन्दं सुधियो वदन्ति कवितां गायन्ति सद्धर्षिता:

हृल्लेखा:सततं स्फ़ुरन्ति जगतः काव्यं चमत्कारकम्।

कालो याति विपश्चितां प्रतिपलं शास्त्रान्तरं पश्यताञ्

चेतस्तापमपाकरोतु सततं कल्लोलिनीयं सताम्।३।


एकस्मिन्पटले भवन्ति बहुशो विद्वज्जना योजिता

भारत्या:समुपासका नव नवोन्मेषप्रभा भूषिता:।

आत्मानन्दविधायिनी सुकविता भागीरथी शान्तिदा चेतस्तापमपा करोतु सततं कल्लोलिनीयं सताम् ।४।


नैके सिद्धसुहस्तका:सुकवयः काव्ये कृतास्तूद्यमा

लालित्येन समन्वितां सुकवितां नानाविधां कीर्तिदाम्।

गायन्त:प्रभवन्ति यत्र कवयस्त्वाभाषिके पाटले 

चेतस्तापमपाकरोतु सततं कल्लोलिनी धीमताम्।५।


डॉ०अवनीशधरद्विवेदी

   ०८/०५/२०२६

युद्धं न शान्तिप्रदम्

 युद्धे नाशमुपैति जीवनमिदं हानिस्तु नित्यं मतं

लोकानां खलु जायते क्षतिमहत्पूर्तिं न कर्तुं क्षम:।

सर्वत्र प्रसृता भवेद्धि सततं हा हा ध्वनिर्नित्यशस्

तस्माद्वच्मि विचार्य एव मनसा युद्धं न शान्तिप्रदम्।१।


स्तोकेनैव सुलाभभावसुधिया राष्ट्रोन्नतिं काङ्क्षता

राष्ट्राणां खलु वर्धते भुवि महद्वैरस्य भावोऽधिक:।

स्वार्थांधो मनुजस्तनोति गरलं सर्वत्र गृद्ध्रन्मुहुस्

तस्माद्वच्मि विचार्य एव मनसा युद्धं न शान्तिप्रदम्।२।


देशो नाशमुपैति गच्छति मुहुर्मृत्योर्मुखं प्रत्यहम्

शस्त्राणां बहुगर्जनेन सकला भीता जना भूूरिशः।

युद्धेन प्रतिवासरं प्रतिपलं संजायते दूषितम्

तस्माद्वच्मि विचार्य एव मनसा युद्धं न शान्तिप्रदम्।३।


शान्ति:स्यात्सुखदा प्रसारितकरा लोकोन्मुखा भूतिदा

शस्त्रास्त्रैःजगतो भवेन्न हननं लोको भयाद्वर्जितः।

जीव:स्वास्थ्यमुपेत्य स्वस्थमनसा सम्यग्लसेज्जीवनं 

तस्माद्वच्मि विचार्य एव मनसा युद्धं न शान्तिप्रदम्।४।


माता रोदिति पुत्रको मम गत:पुत्र:कवचिद्वै तथा

भार्या रोदिति सौभगं मम गतं भ्राता हृतो वै कथम्।

एवं रोदिति सर्वथैव भगिनी नूनं कुटुम्बस्तथा

तस्माद्वच्मि विचार्य एव मनसा युद्धं न शान्तिप्रदम्।५।


युद्धे कोपि हतो भवेद्भवति वै हानिर्मनुष्यस्य हि

युद्धेनप्रतिवासरं भवति वै सर्वत्र हानिःपरा।

युद्धं नास्ति विकल्पमस्य जगतःशान्त्यैव भद्रं सदा

तस्माद्वच्मि विचार्य एव मनसा युद्धं न शान्तिप्रदम्।६।


तुच्छस्वार्थधिया व्रजन्ति सततं सक्ता जना:सर्वतो

वाग्युद्धेन समारभन्ति चरितं शस्त्रांततां याति यत्।

नानाशस्त्रविताननेन सुजना लोका: क्षयं यान्ति वै

तस्माद्वच्मि विचार्य एव मनसा युद्धं न शान्तिप्रदम्।७।


मान्या वै शृणुत प्रबुद्धसुजना: कालोऽह्ययं केवलं

दूरादेव करं प्रगृह्य बलवान् भुङ्क्ते समन्ताज्जगत्।

लोकोऽयं क्षणभङ्गुर:प्रतिपलं सिक्तासमं संस्खलन्

तस्माद्वच्मि विचार्य एव मनसा युद्धं न शान्तिप्रदम्।८।


युद्धेनाद्य समे भवन्ति विकला देशा धरायां स्थिताः

सर्वत्रेन्धनमार्गमस्ति पिहितं पोता: समुद्रङ्गता:।

सर्वे मार्गमवेक्षयन्ति चकिता मार्गोवरुद्धस्तथा

तस्माद्वच्मि विचार्य एव मनसा युद्धं न शान्तिप्रदम्।९।


कोऽप्यस्तिप्रमुखं प्रवक्ति भव हे संचालितो मेऽनुगः

कोऽप्यस्ति प्रखरं करोति सजवं त्वण्वस्त्र संधानकम्।

यावल्लोकविलोकयेद्भवति वै देशो हतस्त्वस्त्रतस्

तस्माद्वच्मि विचार्य एव मनसा युद्धं न शान्तिप्रदम्।१०।


लोकःशान्तिमुपैतु गच्छ्तु परं भद्रं शुभं वाञ्छतः 

शुभ्रं वाक्प्रददातु राष्ट्रसकल:शस्त्रास्त्रमाकुञ्चयन्।

युद्धेनास्ति गतिर्मति:सुविमला सञ्जायतां वै नृणां

तस्माद्वच्मि विचार्य एव मनसा युद्धं न शान्तिप्रदम्।११।


दिनेशचन्द्रनजोशिविंशतिका

 चैत्र मासेऽसिते भानुवारे शुभे

दर्शनायां तिथौ रेवती भे तथा।

भारतस्योत्तरेचोत्तराखण्डके

ब्रह्मविद्विप्रपूज्यो दिनेशोह्यभूत् ।१।


उत्तरस्य प्रदेशस्य राज्यात्पृथक्

राज्यखण्डो ह्यभूदुत्तराञ्चो वर:।

उत्तराखण्डनाम्ना प्रसिद्धो महद्

द्वि:सहस्राब्दके सप्तवर्षे शुभे।२।


स्कान्दके मानसे खण्डके प्राप्यते

कौशिकी शाल्मली शैलजोर्मध्यगः।

पर्वतो विद्यते पुण्यकाषायक:

पश्चिमे क्षेत्रके तस्य विष्णो:पदम्।३।


पर्वतं ह्येतदेवास्ति चाल्मोडकं

क्षेत्रमेतद्वरं सर्वतो धार्मिकम्।

प्राक्तनं सुप्रसिद्धं च भौगोलिकम्

ख्यातमासीत्पुरेदं तु कूर्माञ्चलम्।४।


देवदेवस्य विष्णो:प्रभोर्मुक्तिदस्या

वतारस्य कूर्मस्य दिव्यं स्थलम्।

लालितं पालितं दिव्यदिव्यं परं

भुक्तिदं मुक्तिदं शान्तिदं कामदम् ।५।


श्रीहरेर्द्वारके पावने स्थानके

जाह्नवीतोयपूते पवित्रे तटे।

तीर्थविप्रस्य कूर्माञ्चलस्यान्तिके

वर्णनं गर्गवंशस्य सम्प्रापते।६।


विप्रवर्णे कुले गर्गगोत्रोद्भवो

जोशिनाम्ना प्रसिद्धो दिनेशोह्यभूत्।

शास्त्रनिर्देशिते विप्रवर्णे कुले

जायते कर्मषट्कं च यस्मिन्कुले।७।


शक्तिसम्पूजनस्यास्ति यस्मिन्कुले

सुप्रसिद्ध:क्रमो देवतायार्चने ।

त्यागभावैर्लसन्त:परं सौभगा

दानदाक्षिण्ययुक्ता: परं तापसा:।८।


संध्यया संयुतस्तर्पणे संरतो

ब्रह्मणत्वस्य षट्कर्मणि व्यापृत:।

ब्रह्मविज्ज्ञानवान्य: परं पूजितो

जोशिवर्य:प्रपूज्योदिनेश:सदा।९।


वेदवेदांगसंवित्प्रवक्ता महान्

ब्रह्मवेत्ता तथाष्टाङ्गयोगे रतः।

पंचबलिवैश्वदेवस्य पूजायुतो

जोशिवर्योदिनेश:प्रपूज्य:सदा।१०।


वेदमातु: समाराधने तत्पर:

प्रातमध्याह्नसायं त्रिसंध्यायुतः।

छात्रसम्पत्तिरासीद्महद्यस्य वै

जोशिवर्योदिनेश:प्रपूज्यो वर:।११।


शब्दशात्रस्यमर्मज्ञ आसीत्तथा

धर्मवेत्ता श्रुते:सारसञ्चारक:।

पर्वतीयस्य सत्संस्कृतेर्रक्षको

जोशिवर्यो दिनेशःप्रपूज्यो वर:।१२।


आत्मसाद्येन वेदाश्चकृत्स्नं कृताः

स्कन्दरीत्याव्रजन् धर्मनिष्ठश्चरन्।

तीर्थयात्रां तपश्चर्यया योऽकरोज्

जोशिवर्यो दिनेश: प्रपूज्यो वर:।१३।


येन यज्ञास्त्वनेके कृता: कारिताः 

येन संचेतना मानवानां कृता:।

येन भक्ताः प्रबुद्धाः पुनर्जागृता:

जोशिवर्यो दिनेश:प्रपूज्य: सदा।१४।


येन विद्यालयाः संस्कृतस्योत्तमाश्

चलिताश्चालनार्थं च सम्प्रेरिता: ।

 चेतना संस्कृतेर्येन संवर्धिता

जोशिवर्यो दिनेशः प्रपूज्यः सदा।१५।


वेदविद्यालया: संकुला नैकशो

यस्य निर्देशने स्वास्थ्यलाभङ्गता:।

उत्तराखण्डराज्यस्य भाषाद्वितीयं

भवेत्संस्कृतं कल्पितं नैकधा।१६।


बाल्यकालाद्धियो वेदावेदाङ्गिकं

शिक्षणं प्राप्तवान् स्वीयपित्रादिना।।

तीर्थयात्रां चरन्नर्जितं ज्यौतिषं 

शाकुनम्वास्तुशास्त्रं च वेदान्तकम्१७।


जीवनस्यास्य प्रत्येकमासीत्क्षणं

धर्मसंरक्षणे संस्कृतोन्नायने।

वाणिरासीद्गभीरा परावैदिकी

लोकसन्मङ्गलस्योत्तमा कामना।१८।


शाक्त आसीत् परं तेजसा भूषितो

भव्यभाले सुगन्धेर्युतञ्चन्दनम्।

श्वेतवर्णावृतश्चात्ममोहात्पृथज्

जोशिवर्यो नमंस्यःपरं साधकः।१९।


पञ्चभूतात्मकं देहयष्टिं यदा

त्यक्तवाञ्जोशिवर्य:सुनीलाग्रत:।

वेदपाठं करोतिष्म पौत्रो वरश्

चैत्रमासस्य शुक्लाविरासीत्तिथि:।२०।


डॉ.अवनीशधरद्विवेदी

   रा.स.बा.वि.खि.

       देहली

मातर्दयां मे कुरु

 मातस्ते चरणे रमेन्मम मनो गाथां प्रगायेत्सदा

स्तोत्रं ते प्रसरेन्ममापि च धिया काव्यं सरेत्ते सदा।

विन्ध्येपर्वतके वसन् कुरु कृपां कार्यं भवेत्सर्वदं

सार्थक्यं ननु लेखनी भजतु मे धन्यं भवेज्जीवनम्।१।


स्तोत्रं ते विलिखेन्मदीयकलमो गानं गुणस्यापि च

प्राकामं सुमनः सदा लसतु मे पादाम्बुजे तावके।

ध्यानं पूजनमर्चनादि सकलं कुर्यामहं भक्तितो

मातस्ते चरणे रतिर्भवतु नो विन्ध्येश्वरि प्रीतिदे।२।


मन्दोहं मतिमन्दतां हर सदा सर्वेश्वरि प्रार्थये

पापात्मा किल जन्मजन्मभिरहं याचे कृपां तावकीम्।

पुत्रो याति कुपुत्रतां जगति चेन्माता कुमाता क्वचित्

तस्मात्त्वय्यहमस्मि वच्मि सततं मातर्दयां मे कुरु।३।


विन्ध्येपर्वतके वसन् प्रकुरुषे लोकस्य सम्पालनं 

कामं कामयतो भवन्ति सफ़ला:कमॉंल्लभन्तो जना:।

लोकास्ते कृपया भवन्ति सुखिनो मातस्त्वदीया कृपा

किं किं नैव सुसाधयेत्तव सदा भुक्तिप्रदा मुक्तिदा।४।


दीनो हीनजनोऽस्म्यहं शृणु मुहुस्त्वज्ञानकूपं गतो

जन्मान्तर्यविपाकपाकगलितो मातोऽस्म्यहं पीड़ितः।

यद्यद्बन्धनमस्ति नो कुरु कृपां क्षीयेत सर्वं यथा

मातस्ते कृपया भवेन्मम रुचि: काव्ये परं शाश्वती:।५।


डॉ०अवनीश धर द्विवेदी

   शिवगङ्गा वसुन्धरा

    ३०/०५/२०२६


व्रजरसमाधुरी

 मद्धम मद्धम पवन बहत नित रहत सुगंध लुटाई

डाली डाली झूमत निसदिन लेत रहत अंगड़ाई।

शुक सारिक डालिन पर निवसत रहत मंद मुसुकाई

भागि सुभागि भयो अवनीश के बरनत हिय हर्षाई।१।


जागि गये प्रभु नटवर नागर वृन्दावन विच जाई 

राधा प्राणप्रिया संग निरतत वेणुमधुर धुनि लाई।

संग समस्त गोपिजन विलसत मनहि उमंग समाई

देखि प्रात मंगल छवि पुलकित जनजन मन हर्षाई।२।


ग्वालबाल गइयन संग विचरत नंदकिशोर कन्हाई

यमुना तट पट ओढ़ि गोपिजन भरन जात जल भाई।

मध्यमार्ग प्रभु करत तंग संग सखा रहत मुसुकाई

गोपिन कर मटकी नित फोरत बांह पकरि हर्षाई।३।


कालिंदी तट खेलत थिरकत चंचल कृष्ण कन्हाई

वेणु बजावत गावत ध्यावत गइयन सब पगुराई।

कन्दु गयो जमुना जल में तब कूदि पड़े मचलाई 

कालियनाग नाथि फन निरतत नटवर कृष्ण कन्हाई।४।


वृन्दावन जन व्याकुल धावत जमुना तट झट आई

नन्द यशोदा जानि सकल वृत व्याकुल धाये भाई।

देखि नाग फन निरतत हर्षित श्यामल चपल कन्हाई

अति आनन्दित ग्वालबाल संग नंदयशोदा माई।५।


जग तारन प्रभु जग अवतरि शिशु वसत नंदगृह जाई

गोपीजन ऋषिमुनि तपधन सब वेदऋचा ऋजुताई।

रूप धार मानव बनि आये देवन अति सुख पाई

कहत सुनत प्रभु चरित मनोहर हिय आंनद समाई।६।


निरखि श्यामकर बाल रूप मन देवन कर हर्षाई

रूपशील गुण चपल कृष्णकर निरखि निरखि मन भाई।

माखन खात खियावत प्रभु नित ग्वालबाल संग जाई

धन्य सरस्वति भइ अवनीश की बरनत चरित कन्हाई।७।


डॉ०अवनीशधरद्विवेदी

  शिवगङ्गा वसुन्धरा 

    ०७/०५/२०२६

     💐💐🙏🙏

अवंतिमाहात्म्यम्

 अवन्त्या ऐतिह्यं मुनि सुसरभङ्गेन सुमतं

ऋषिः ह्येषस्तावच्छ्मदमदयादानभरित:।

प्रभुश्रीरामस्य कविषु पूज्यस्याथ तपसो

मुनिर्वाल्मीकेश्च प्रभवति सखे कालिकजन:।१।


सुनद्या:शिप्राया वसति सविधे या शिवपुरी

अवन्तेर्नाम्ना या जगति बहुधा विश्रुतपुरी।

पुरीषु श्रेष्ठा या भवति सुभगा मुक्तिकरिणी

प्रसिद्धा शम्भोर्या परमकृपया पालितपुरी।२।


महाकालो यत्र प्रभवति हरस्त्र्यम्बकविभु:

सहायो भुक्त्यर्थं वसति भगवान्तीर्थनगरे।

दिव: खण्डं त्वेकं हृतमिव सखे कान्तिकमनम्

पुनीतं यद्वारं जगति परमं मोक्षसुलभम्।३।


पुरीयं धन्या नो भवति शुभदं स्नानपरमम्

गतेसिंहं भानौ भवति सुखदं पुण्यजननम्।

तपोनिष्ठा:सिद्धा:प्रतिपलसुतप्ताश्च मुनय:

समायान्ति स्नातुं विविधजपयागादिनिरता:।४।


चरञ्छिप्रावातः प्रियतममनो यस्तु हरते

हरत्यङ्गग्लानिं परिचरति खेदं च नयते।

प्रसिद्धा:संत्यत्र क्षणमपि वदन्त्यो युवतयः

प्रहारो याषां स्यान्नयनजनितो भावभरित:।५।


अवन्त्यां श्रीदेवो निवसति महाकालसुखदः

पुरस्ताद्देवस्य विलसति जलाप्लावित सर:।

निमज्जन् संसार: सततमिह मुक्तिं च वृणुते

प्रसिद्धोयम् कुण्डो विदधति सदापुण्यपरक:।६।


अवन्तिक्यां पुर्यां प्रवहति नदी गन्धवतिकी 

तटे तस्या: देयं सविधविधिवत्पिण्डकपरम्।

तपस्तप्तं घोरं परममुनिना चात्रि सुधिया

ततो जातः सोम:प्रभवति तत:सोमवतिका ।७।


पुराणे स्कान्दे वै शिवशिवकरोरुद्रभगवान्

अवन्तिक्यामेव त्रिपुरमहनद्रुद्रशिवदः।

तत:प्रख्यातेयं प्रथितनगरी पुण्यदवरा

प्रसिद्धिं संप्राप्ता विविधबहुसाक्ष्यैरुपगता।८।


प्रभु:श्रीकृष्णोपि प्रमुदितमनाऽसेवदममुं

गुरुःश्रीदेवस्य प्रथितसुपुरी ज्ञानदवरा।

ततो मित्रंयातो द्विजकुलवरो मित्रगहन:

सुदामेत्याख्यातो परमतपपूतोऽतिविमल:।।९


डॉ० अवनीश धर द्विवेदी 

          अध्यापकः 

    रा०स०बा०वि०खि०

          देहली-९१

दिल्लीपुलिस

ये दिल्ली पुलिस हमारी है करती सबकी रखवारी है। भय भ्रान्ति मुक्त होवे दिल्ली  हम सबकी जिम्मेदारी है ।१। ये दिल्ली पुलिस हमारी है...... हाँ इस...